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इस दुर्दशा का अंत नहीं

बोर्ड के एग्जाम शुरू हो चुके हैं। पहले ही दिन हिन्दी का पर्चा करीब दो लाख लड़के लड़कियों ने नहीं दिया। आजकल आकाशगामी बातों पर ज़ोर ज्यादा है सो ज़मीनी बातों पर लोग ज्यादा ध्यान नहीं देते। और फिर बात हिन्दी की हो तो ये मान लिया जाता है कि यह भाषा तो बनी ही दुर्दशा के लिए है और यह सोच कर बात भुला दी जाती है। लेकिन यह संकेत गम्भीर है और इशारा कर रहा…
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प्रेम के लिए एक दिन ही क्यूँ!

प्रेम तो सिर्फ प्रेम होता है ना कोई स्वार्थ ना ही कोई लालच, न ही पाने की खुशी न ही खोने का डर! प्रेम कोई लक्ष्य तो नहीं जिसे पाना एकदम से जरूरी हो प्रेम तो…
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पढ़े-लिखे लोगों के अपराध

आज कल कोई भी अखबार उठा कर देखें आपको साइबर क्राइम की तमाम ख़बरें देखने को मिलेंगी लेकिन उनमें से कितनों में जांच पूरी होकर अभियुक्त पकड़े गए ये बात डीटेल में नहीं…
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हर किसी को हर बार मूर्ख बनाना असम्भव

कहावत है कि किसी व्यक्ति को मूर्ख बनाना सम्भव है, कुछ लोगों को कई बार मूर्ख बनाना सम्भव है लेकिन हर किसी को हर बार मूर्ख बनाना असम्भव है। छोटी सी कहावत है सो छोटे लोगों को समझ में आ जाती है। लेकिन बड़े लोग अपने बड़प्पन के मद में शायद साधारण चीज़ें समझना ही नहीं चाहते...
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समझ में नहीं आतीं ये उलटबासियाँ

पिछले करीब दो दशक से देश की माली हालत ख़ासतौर से चर्चा का विषय होती है। इसमें कम से कम दो बातें साफ़-साफ़ समझ में आती हैं, एक तो साफ़ सुथरी अंग्रेज़ी में धीरे-धीरे…
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संस्कृति स्कूल सुधार पायेगा कार्य संस्कृति ?

जब अँगरेज़ हिंदुस्तान पर कब्ज़े के बाद यहाँ के शासन को व्यवस्थित करने में जुटे थे। उनकी अपनी प्राथमिकताएं थीं और तदनुसार वे संस्थाएं गढ़ रहे थे। आन्तरिक प्रशासन…
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सतरंगे मास्टरों की बदरंगी दास्तान

हम लोगों के बचपने में शिक्षा व्यवस्था बहुत सपाट सी हुआ करती थी मिडिल, इन्टर और यूनिवर्सिटी की पढ़ाई होती थी जिनको मास्टर, प्रवक्ता और प्रोफेसर साहब पढ़ाया करते थे। मास्टर बहुत ही आदरसूचक शब्द होता था जिसका मतलब हुआ मालिक यानी बच्चे को मालिक के हाथों सौंप माँ-बाप निश्चिन्त हो जाते थे और अधिकाँश मास्टर भी इस विश्वास पर खरे उतरते थे। हालांकि बाद के…
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सुनहु तात, अब पौध कहानी

महाराष्ट्र में पिछले साल 30 करोड़ पौधे सरकार ने लगाए और इस साल 33 करोड़ पौधे लगाने के बाद ही वहां की सरकार विश्राम करेगी। सरकार है जो भी करेगी बड़ा ही करेगी यानी…
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कहां गई बदजबानी, वो रूठना और वो मनाना

बहुत पुरानी बात नहीं है। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। पूर्णबहुमत की सरकार होने और मुख्यमंत्री के चाचा होने के नाते आली जनाब आजम खान साहेब का जाहोजलाल भी उरूज पर…
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धंधा है, तो गन्दा भी होगा

बहुत पहले मेरे बचपने में दादी ने कोई मनौती मानी थी और वो पूरी हो गयी रही होगी तो पूरा परिवार तीर्थ यात्रा पर गया था| मै काफी छोटा था लेकिन मुझे पूरी तरह याद है वो यात्रा आनंददायक होने के साथ साथ खासी तकलीफदेह भी थी| रुकने के लिए सिर्फ धर्मशालाएं थीं या फिर रिश्तेदारों के मकान और खाने के लिए कच्चे खाने के साधारण होटल या फिर पूड़ी–तरकारी की दुकाने,…
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एक सजावटी मंत्री की उदास मृत्यु

आमतौर पर मैं ऐसे विषयों पर नहीं लिखता, लेकिन कभी-कभी नियम तोड़ना चाहिए। अपने यहाँ परंपरा है, मृत्यु के बाद किसी की कमियों या दुष्टता पर चर्चा नहीं की जाती। उसके…
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लोहियाजी के सिद्धांतों की सद्गति

कुदरत का निजाम भी अजीब है, कोई चीज़ कितनी भी सुन्दर क्यों न हो कालान्तर में कुरूप हो जाती है। कुछ इसी तरह से ये भी है कि सिद्धान्त ज़्यादातर लोगों के कल्याण के…
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साइट चलाने की बारी अब आपकी

भाइयों यह साइट आपके लिए ही बनाई गयी है। देखने से लग रहा है की अब यह ठीक-ठाक पढ़ी जा रही है। इसलिए अब साइट का दूसरा चरण शुरू करना है। यह काम आपको करना है। आपके इलाके में बहुत कुछ ऐसा होगा जो आप चाहते होंगे की और लोग भी जानें, लेकिन जान नहीं पाते। उसे लिखकर हमारे पास मेल आईडी munna12345anand@gmail.com पर भेज दीजिये। सबजेक्ट में ‘गोल्डेन टॉक में प्रकाशन के लिए’ लिखना न भूलें। उसे इस साइट पर प्रकाशित करने की ज़िम्मेदारी हमारी। इस संबंध में आप जो भी जानकारी चाहें मुझसे मोबाइल नंबर +91-7521924486 पर ले सकते हैं। गुज़ारिश है इस साइट से गंभीरता से जुड़ें। यकीन जानिए कालांतर में समाज को, आप को और हमको लाभ ही होगा।
धन्यवाद

अनेहस शाश्वत
About Me

Anehas Shashwat

स्वतंत्रता मिले आधी शताब्दी से ज़्यादा हुए। इस अवधि में देश लोकतंत्र से भीड़तन्त्र की ओर जाता दिख रहा है। इसके कारण और निदान की पड़ताल बेहद ज़रूरी है। फ़िलहाल इसी काम का आनन्द लिया जा रहा है...

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