- Advertisement -

- Advertisement -

कहां गई बदजबानी, वो रूठना और वो मनाना

0 2,283

बहुत पुरानी बात नहीं है। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। पूर्णबहुमत की सरकार होने और मुख्यमंत्री के चाचा होने के नाते आली जनाब आजम खान साहेब का जाहोजलाल भी उरूज पर था। ऐसे में रहनुमाए मिल्लत और अव्वल-ए-बदजबानी आली जनाब मोहतरम आजम खान साहेब ने खुद को बनाने वाले नेता जी मुलायम सिंह यादव के प्रति आभार प्रदर्शन करना मुनासिब समझा। वे नेता जी को रामपुर ले गए और फूलों की बग्घी में बैठाकर उन्हें नगर दर्शन कराया। क्या नजारा था और कैसा था उछाह। इतने में ही विघ्नसंतोषी पत्रकार पहुंच गए और पूछने लगे कि ऐसे भव्य आयोजन का पैसा कहां से आया। बस, फिर क्या था। आली जनाब भड़क गए। वजह शायद यह रही होगी कि सब जानते हैं ऐसे आयोजनों के पैसे कहां से आते हैं। बावजूद इसके रहनुमा-ए-मिल्लत ने जवाब दिया कि कुछ पैसा दाउद इब्राहिम ने भिजवाया है और कुछ उसके जैसे ही और लोगों ने।
पत्रकारों ने जैसा सवाल किया उन्हें वैसा ही जवाब भी मिल गया। बहरहाल यह तो एक किस्सा भर था। जो रहनुमा-ए-मिल्लत और अब सर सैयद अहमद खान बनने की राह पर निकल पड़े आली जनाब मोहतरम आजम खान साहेब की जेहनी बनावट बताने के लिए जरूरी है। अब पुरानी बात, राजीव गांधी का जमाना था और अयोध्या के विवादित परिसर को हवा दी जा चुकी थी। आंदोलन में शामिल सारे पक्षकारों को इससे होने वाले नफा नुकसान का अंदाजा हो चुका था। विवादित परिसर के उत्तर प्रदेश में होने के नाते मुलायम सिंह यादव का इस नफा नुकसान में हक कुछ ज्यादा ही बनता था। लेकिन तब मुलायम सिंह राष्ट्रीय नेता होने का सपना संजोये थे। इसलिए उत्तर प्रदेश में उन्होंने आंदोलन का चेहरा आजम खान को बनाया। बहुत सोच समझ कर तंज बयानी और बदजबानी को आजम खान ने इस लड़ाई में अपना प्रमुख हथियार बनाया। उस समय आंदोलन में शामिल लोगों में कांग्रेस के अलावा बाकी ज्यादातर हीनतर पृष्ठभूमि के नामालूम से चेहरे थे। उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था और पाने के लिए बहुत कुछ।
खेल शुरू हो चुका था। एक से एक जहर बुझे तीर दोनों ओर से चल रहे थे। कौन ज्यादा बदजबान है, इसकी मानो प्रतियोगिता सी चल पड़ी थी। प्रतियोगिता में आली जनाब मोहतरम आजम खान साहेब अव्वल-ए-बदजबान मुस्लिम पक्ष की ओर से साबित हुए और बदले में उन्होंने लम्बे समय तक सत्ता का सुख भोगा। यह अलग बात है कि बाबरी मस्जिद के शहीद होने में और कारकों के साथ ही रहनुमा-ए-मिल्लत की तल्ख बयानी का भी खासा योगदान रहा। बहरहाल प्रतियोगिता का एक चरण पूरा हुआ। बाबरी मस्जिद गिरा दी गई। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने, मुलायम सिंह पहले ही बन चुके थे। यह सब चतुर सुजान लोग हैं। इस पायदान के बाद सबने आगे की सोची। आली जनाब को भी लगा होगा कि रहनुमा-ए-मिल्लत तो बन ही गए, अब मुसलमानों की पुश्त दर पुश्त कयादत के लिए सर सैयद अहमद खान बनना बेहतर होगा। आखिरकार आली जनाब की आने वालो पुश्तों को भी कौम की खिदमत ही करनी है। इसी बीच जमाना बदल गया और आली जनाब भी अपने वास्तविक रूप में आ गए। अब वे तमीज से बात कर रहे हैं और जो कुछ भी कहा जा रहा है उसको बिना किसी ना नुकर के करते जा रहे हैं। रह गई जौहर विश्वविद्यालय बनाकर बच्चों को पढ़ाने की दुहाई, तो पिछले दो दशकों में जौहर विश्वविद्यालय जैसे सैकड़ों विश्वविद्यालय बने, लेकिन किसी भी विश्वविद्यालय को बनाने वाले को इस कदर मुकदमे नहीं झेलने पड़े। क्योंकि मुकदमों का आधार सिर्फ और सिर्फ रहनुमा-ए-मिल्लत आली जनाब मोहतरम आजम खान साहेब ने ही प्रथम दृष्ट्या मुहैया कराया।

Comments
Loading...