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कैसा लगता है जब डाकू आपकी खुशामद करें

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आव-भगत हुई वो भी संगीनों के साये में 
चाँदनी रात में चम्बल के बीहड़ों की छटा ही निराली होती है। जिस टीले पर आप खड़े हैं हो सकता था कि उसके अगले टीले के पीछे डाकुओं का गिरोह बैठा हो। हम लोग तो सैलानियों की तरह ही वहाँ घूमने पहुँचे थे। पर हमारा अनुभव तो रोंगटे खड़े करने वाला निकला।
लखनऊ से हम तीन पत्रकारों और डीजी आफिस के एक अधिकारी का दल जनवरी 1982 में काल्पी पहुँचा। वहाँ हम लोगों ने एक ऐतिहासिक डाक बंगले, जहाँ कभी अंग्रेज़ों के खिलाफ तात्या टोपे और झांसी की रानी की गुपचुप मंत्रणा हुई थी, में अपना डेरा जमाया। यहाँ मिलना था भारतीय लोक दल के स्थानीय विधायक शंकर सिंह से। उनके खिलाफ तमाम शिकायतें थीं कि वे फूलन देवी गिरोह को संरक्षण देते हैं। इस संबंध में विधान सभा में भी हंगामा हो चुका था लेकिन शंकर सिंह इसे सिरे से नकारते रहे।
एसपी जालौन विजय शंकर द्वारा फूलन को लिखे कुछ पत्र भी सार्वजनिक किए गए जिनमें “चूड़ियां भेजने” और “रास्ता साफ करने” जैसे कुछ कोड वर्ड भी थे। इस संबंध में पुलिस ने शंकर सिंह के ख़िलाफ़ एक मुकदमा भी कायम किया। लगभग साढ़े बारह बजे शंकर सिंह डाक बंगले आए और हम लोगों से बातचीत में इन सारी गतिविधियों को “पुलिसिया हथकंडा” बताया। कहा कि चूंकि वे दस्यु उन्मूलन के नाम पर जो लाखों रुपये पुलिस महकमा उड़ा रहा है उसपर सवाल उठाते हैं इसलिये उनको लक्ष्य बनाया गया है। बीहड़ में तो बिल्कुल शांति है। बस पुलिसवाले ही दस्यु गिरोहों का आतंक बताकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। “आज रात आप लोग मेरे साथ बीहड़ चलिए और खुद देख लीजिए कि वहाँ आतंक है या शांति”, शंकर सिंह ने न्योता दिया। तय हुआ कि रात में नौ बजे के आसपास वह फिर आएंगे और हम लोग रमपुरा के बीहड़ देखने जाएंगे। कहा जाता था मलखान, बाबा घनश्याम, मुस्तकीम और फूलन गिरोहों का चहेता इलाका था रमपुरा के बीहड़।
रात दस बजे तक शंकर सिंह का कहीं अता-पता नही था। हमें भी लगा कि शायद वह किसी पचड़े में न पड़ना चाहते हों। बस हम लोग खाना खाने जा ही रहे थे कि हड़बड़ाते शंकर सिंह आये और बताने लगे कि उनकी जीप खराब हो गई थी तो एक दूसरी जीप के बंदोबस्त में समय लग गया। बस उठिए और तुरंत चलिए और खाना लौट कर खाईयेगा। हम लोग भी जीप में लदे और चल दिये रमपुरा के बीहड़ की ओर जो लगभग वहाँ से 45 कि. मी. दूर था। जीप स्वयं शंकर सिंह चला रहे थे।
हाईवे छोड़कर जीप उन्होंने टीलों की ओर मोड़ दी। टीलों का सकरा रास्ता चूंकि बजरी भरा होता है इसलिए जीप धीरे-धीरे टीले के ऊपर तक पहुँची। हम लोग वहाँ लगभग आधा घंटा रुके, फ़ोटो खींचीं। यह सोचना भी मुश्किल है कि भयावाह बीहड़ चाँदनी रात में कितना शांत और आमंत्रित करता हुआ लगता है। पेट में चूहे कूद रहे थे सो शंकर सिंह से कहा कि अब वापस चला जाये। अमूमन इन बीहड़ों में जाने और आने का रास्ता एक ही होता है और रास्ता भी पहाड़ों की तरह घुमावदार होता है। लौटने की यात्रा शुरू हुई। लगभग तीन कि. मी. ही गए होंगे कि एक मोड़ पर झटके से जीप रुकी। जाने का रास्ता पेड़-डालियाँ डालकर बंद किया गया था। शंकर सिंह स्थिति भांप ही रहे थे कि सड़क के दोनों ओर से हवा में फायरिंग हुई और टॉर्च की रोशनी जीप पर पड़ी। जीप के पीछे हमारे साथ शंकर सिंह का गनर भी अलर्ट बैठा था।
शंकर सिंह चिल्लाये, “जे कौन सो गैंग है? नाम बताओ।” टॉर्च की रोशनी शंकर सिंह के मुँह पर पड़ी। “अरे दाऊ तुम हो। हमसे बड़ी भूल है गयी,” यह कहकर गैंग का जो संभवतः सरदार था वह शंकर सिंह के पैरों पर गिर पड़ा और माफ़ी की गुहार करने लगा। बाद में शंकर सिंह ने बताया कि यह मुस्तकीम का पार्ट गैंग था।
फ़िर शंकर सिंह ने चुनचुन कर अपशब्द गैंग के 8-9 सदस्यों से कहे। साथ ये भी कहा कि तुम लोगों ने लखनऊ के पत्रकारों के सामने हमारी और बीहड़ की नाक कटा दी। डाकुओं का सरदार फिर घिघियाने लगा और शंकर सिंह से बोला कि अब इन मेहमानों को स्वागत, नाश्ता-पानी किये बगैर नहीं जाने देंगे। हम लोगों के लाख मना करने पर डाकू हमारे पैर छूने लगे। स्थिति कहीं बिगड़ न जाए यह सोचकर हम गैंग के साथ टॉर्च की रोशनी में धीरे-धीरे टीले से उतरने लगे। गिरोह का सरदार अपनी सफाई देता चल रहा था। हमे लगा कि पैसे वालों के मोड़े (लड़के) जंगल में शिकार खेलने निकले हैं। इन्हें लूटेंगे तो हथियार भी मिल जाएंगे। “दाऊ” की जीप तो हम सब पहचानते हैं लेकिन इस दूसरी जीप के चक्कर में धोखा हो गया।
बात करते-करते हम लोग वहाँ पहुँचे जहाँ गैंग का खाना बन रहा था। दो-दो गरम देसी घी की पूड़ियाँ, आलू की रसेदार सब्ज़ी और साथ में एक-एक बड़ा गिलास औंटा हुआ दूध। साथ में बार-बार माफ़ करने का इसरार और ऊपर से संगीनों का खौफ़। पूड़ी का एक-एक कौर बड़ी मुश्किल से गले उतर रहा था। आधी रात के बाद का वक़्त हो चला था सो हम लोगों ने शंकर सिंह से वापस चलने का इशारा किया। फ़िर शुरू हो गई माफ़ी माँगने की झड़ी। गिरोह के सरदार ने हम लोगों का इक्यावन-इक्यावन रपये से तिलक लगाकर विदाई की। जीप में सब दम साधे बैठे रहे और जब हाईवे पर पहुँचे तब साँस में साँस आयी। मैंने तंज़ में शंकर सिंह कि चुटकी ली, “दाऊ आपके तो चम्बल के डाकुओं से संबंध हैं ही नहीं। क्यों दाऊ?” शंकर सिंह मुस्कुरा के बोले, “अब हाईवे पर आकर आपको पत्रकारिता याद आई है…?”

 

( वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक जागरण उत्‍तर प्रदेश

के पूर्व राज्य संपादक दिलीप अवस्थी )

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