The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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पुरखों का पाप भोगते लाचार संविदाकर्मी

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पुरखों के पाप और पुण्य दोनों के ही फल उनकी संतानों को भोगने पड़ते हैं, यह बात पारिवारिक सन्दर्भ में तो सही है ही वृहत्तर सामाजिक परिप्रेक्ष्य में भी सही प्रतीत हो रही है। आज की तारीख में उभर कर आये संविदाकर्मियों के खासे बड़े वर्ग की दास्तान को इस कसौटी पर कस कर आसानी से समझा जा सकता है। पुरखों के पाप से उपजे इस संवर्ग की लाचारी को लगातार गैर ज़िम्मेदार होती जा रही सरकारों ने कुछ ज्यादा बढ़ा दिया है। स्वतंत्रता के बाद लम्बे समय तक बनने वाली सरकारें जनसरोकारों की तरफ खासे रुझान वाली रहीं, उन्होंने यथासंभव समाज के सारे वर्गों का ध्यान रखा। उसमे भी सरकारी कर्मी सबसे बड़ा संगठित वर्ग होने के नाते सबसे ज्यादा फायदे में रहे, सुरक्षा और संरक्षा में वे बेहद फले–फूले।

स्वतंत्रता के बाद करीब तीन दशक तक सरकारें ही रोज़गार देने वाली सबसे बड़ी घटक थीं और उन्हें इस बात का अहसास भी था, सो बहुत बड़ी संख्या में लोगों को सरकारी नौकरियां मिलीं। लेकिन सरकारों ने जिस सदाशयता से नौकरियां दीं, अधिकाँश लोगों ने उसी अनुपात में बदनीयती से नौकरियां कीं। ज्यादातर महकमे काहिली और रिश्वतखोरी के लिए बदनाम होने लगे। सबसे ऊपर बैठे नौकरशाह से नीचे चपरासी तक कामचोरी के रिकॉर्ड बनने लगे। अब सरकारों ने भी रुख बदला और वे माई–बाप से प्रबंधक की भूमिका में आ गईं। जो सरकारी नौकरियां पा चुके थे उनका तो कुछ नहीं किया जा सकता था लेकिन नए सिरे से निचले स्तर पर डेली वेजेज कर्मचारियों के बतौर नौकरियां दी जाने लगीं। शुरुआत में तो कुछ फर्क पड़ा लेकिन बाद में कानूनी उपबंधों और अदालतों की सदाशयता का फायदा उठा अधिकाँश ने नौकरियां पक्की करा लीं और मस्त हो गए।

यह सिलसिला मोटे तौर पर सन 2000 तक चला, इसी समय में बहुत तेज़ी से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन भी हुए। नतीजे में 21वीं शताब्दी पूरी तरह से बदले सरोकारों के साथ अवतरित हुई। बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी और प्रबंधन के क्षेत्र में विश्व बैंक के दबाव की वजह से सरकारों के लिए जनसरोकारों के लिए कम स्थान बचा और घरेलू बजट का प्रबंधन मुख्य हुआ। ऐसे में निचले स्तर पर जहां बहुत ज्यादा कुशलता की ज़रुरत नहीं है, सरकारी विभागों में भी ठेके पर नौकरियां दी जाने लगीं। इनकी सेवा शर्तें ऐसी बनाई गयी हैं कि इन्हें नौ से पंद्रह हज़ार रुपये माहवार के मजदूर समझें जिनका फिलहाल कोई भविष्य नहीं है  और इन्हें कभी भी निकाल दिया जाता है।

बावजूद इसके चरम बेरोजगारी के दौर में इन नौकरियों के लिए भी मारा–मारी है, शायद इसी वजह से सरकारें भी इनकी तरफ से लापरवाह हैं। लेकिन घड़ी का पेंडुलम अब दूसरी ओर घूम चुका है, कामचोर नियमित कर्मियों की वजह से ये संविदाकर्मी कई विभागों में निचले स्तर पर अपरिहार्य हो चुके हैं। सरकारी अस्पताल में संविदाकर्मियों की हड़ताल से उपजी अफरा–तफरी इस बात की गवाह है। ऐसे में सरकारों ने अगर इन संविदाकर्मियों के प्रति रवैय्या नहीं बदला तो आज नहीं तो कल व्यवस्था चरमराते देर नहीं लगेगी। वैसे भी अगर सरकारें इन्हें स्थाई नौकरी नहीं दे सकतीं तो मानवीय गरिमा के अनुरूप जीवन यापन के संसाधन तो दे ही सकती हैं, जो संविधान में लिखा भी है।

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