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आडवाणी पर राम का कोप हुआ, और कुछ नहीं….!

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हो सकता है आर एस एस बहुत ही देशभक्त और काबिल लोगों का संगठन हो, लेकिन इतना तय है यह एक बंद सा संगठन है, जिसके बारे में जानकारी बहुत स्पष्ट नहीं है. जो लोग इससे जुड़े हैं वे ही इसके बारे में कायदे से जानते हैं. आडवाणी लम्बे समय तक संगठन के शीर्ष पर रहे इसलिए मानना चाहिए कि संगठन के उद्देश्यों से वे पूरी तरह वाकिफ़ रहे होंगे.

आडवाणीजी के बारे में जितनी जानकारी सार्वजनिक है उसके मुताबिक वो खासे पढ़े-लिखे सज्जन हैं और भाजपा को शासक दल बनाने में उनका सबसे ज्यादा योगदान है, अटल बिहारी वाजपाई से भी ज्यादा. इस पृष्ठभूमि के हिसाब से कहा जा सकता है कि राम मंदिर आन्दोलन के लिए संघ और भाजपा की जो भी योजना रही होगी आडवाणीजी को मालूम रही होगी.

राजीव गाँधी प्रधान मंत्री थे और राम मंदिर आन्दोलन जोर पकड़ने लगा था, राजनीति के कई जानकारों का कहना है मूलतः ये आन्दोलन कांग्रेस का था, जिसे भाजपा ने झपट लिया. बहरहाल सच जो भी रहा हो लेकिन भाजपा के हाथों में राम मंदिर आन्दोलन की कमान पूरी तरह से आ गई और इसके मुख्य शिल्पी बनकर उभरे लाल कृष्ण आडवाणी. उन्होंने आन्दोलन सफल हो इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ी,रथयात्रा निकाली और वी पी सिंह की सरकार भी कुर्बान कर दी.

आख़िरकार नरसिंह राव के ज़माने में मस्जिद गिरा दी गई और अस्थाई राम मंदिर बनने के साथ राम मंदिर आन्दोलन का एक चरण पूरा हुआ. इस पूरे आन्दोलन में दो बातें हुईं एक तो भ्रम का घटाटोप बना दूसरे यह बात सामने आई कि राम मंदिर आन्दोलन भाजपा को राष्ट्रव्यापी दल बनाने में असफल रहा. यह बात सामने आते ही भाजपा और उसके तत्कालीन शिल्पी आडवाणी ने राम मंदिर को उसके हाल पर छोड़ा और भाजपा को फैलाने के दूसरे आजमूदा उपायों पर अमल शुरू किया.

नतीजे में अटलजी के प्रधानमंत्रित्व में पहली गठबंधन सरकार बनी. यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि राम मंदिर आन्दोलन के बारे में आम जनता की चाहे जो धारणा रही हो, संघ के शिल्पी होने के नाते आडवाणी तो जानते ही रहे होंगे कि भगवान राम भाजपा के सत्ता संधान के प्रयोग में निमित्त मात्र थे, उनके मंदिर के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं थी. बहरहाल लगता है, इसी समय से धीर – गंभीर भगवान राम, मंदिर आन्दोलन के मुख्य शिल्पी आडवाणी से कुपित हो गए.

नतीजे में उन आडवाणी, को जिन्होंने भाजपा को राष्ट्रव्यापी शासक दल बनाया, उनकी पार्टी ने ही कौड़ी का तीन कर दिया. वैसे भी यह तो होना ही था. शासक पार्टी भावनाएं नहीं देखती. वह सत्ता में बने रहने के लिए ही काम करती है. ऐसे में राष्ट्रपति पद के लिए आडवाणी के बजाये दलित राम नाथ कोविंद आज के दौर में बेहतर प्रत्याशी हैं. यह सब जो हुआ सो हुआ लेकिन यह भी होगा कि संघ, भाजपा और नरेन्द्र मोदी की कृतघ्नता इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी, राष्ट्रहित की आड़ में ये तीनो चाहे जो भी दुहाई दें.

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