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अपने ही डेथ वारंट पर दस्तखत कर रहा समाज

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इसी 3 फरवरी को गोरखपुर में एक घटना घटी और आई गयी हो गयी, एक व्यवसाई ने अपने परिवार को ज़हर देकर मार डाला फिर खुद भी आत्महत्या कर ली। खबर में बताया गया उस पर लाखों रुपये, लगभग दस लाख का क़र्ज़ था और क़र्ज़ देने वाले उसे तंग कर रहे थे, साथ ही उसका व्यवसाय भी घाटे में जा रहा था। प्रथम दृष्ट्या इस घटना में कुछ बातें साफ़ हैं, उसने लोन बाज़ार से लिया होगा जिनकी ब्याज दर बहुत होती है कई बार तो दस फीसदी माहवार तक। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि लाख हल्ले के बावजूद बैंक आसानी से लोन नहीं देते, नतीजे में लोग बाज़ार से क़र्ज़ लेते हैं।

बाज़ार का सिस्टम होता है कि सूदखोर लोगों की गरज के हिसाब से ब्याज दर लगाते हैं, हालांकि इस ब्याज दर पर भी कानूनी शिकंजा होता है लेकिन उसको मानता कोई नहीं। अब ऐसे में होता ये है कि कई बार अपरिहार्य स्थितियों में व्यवसाई बाज़ार से ऊंची दर पर क़र्ज़ ले लेते हैं और समय पर नहीं दे पाने की वजह से क़र्ज़ के मकड़जाल में फंस जाते हैं। ये कोई नई बात नहीं हैं बाज़ार में सब इसे जानते हैं। गोरखपुर के व्यवसाई के मामले में हुआ यह होगा कि ऐसी स्थिति आने पर किसी को बचाने के लिए समाज के जो सेफ्टी वॉल्व होते हैं वे उसे उपलब्ध नहीं हुए। न तो नामचीन लोगों ने सूदखोरों पर दबाव डाला होगा और न ही रिश्तेदारों से उसे किसी भी तरह की सहायता की उम्मीद बची होगी। ऐसे में व्यवसाई ने सपरिवार मौत को गले लगाना ही श्रेयस्कर समझा। असहाय लोगों की आजकल के समाज में हो रही दुर्दशा ने उसे परिवार को भी ख़त्म करने की प्रेरणा दी हो सकती है।

समाज में ये माहौल कोई नई बात नहीं, आये दिन हम आप इसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में देख भी रहे हैं। ऐसी घटनाएं होने लगी हैं जो पहले बहुत कम या लगभग न के बराबर होती थीं, गृह कलह या आर्थिक तंगी से परेशान होकर लोग सपरिवार आत्महत्या कर लें, ऐसा ज्यादा नहीं 20-25 साल पहले कोई सोचता भी नहीं था, जबकि तब का समाज आज की तुलना में विपन्न और पिछड़ी सोच का माना जाता था और था भी। लेकिन वह इतना आत्मकेन्द्रित समाज नहीं था साथ ही उसकी प्राथमिकताएं भी स्पष्ट थीं, जिसमे पड़ोसियों और रिश्तेदारों की भलाई के लिए भी पर्याप्त सोच थी।

अब ऐसा नहीं है, अब सिर्फ मैं और मेरा परिवार और कई बार तो वो भी नहीं। घनघोर स्वार्थ और प्राथमिकता विहीन अंधी दौड़ ने समाज को ऐसा बना दिया है। नौबत यहाँ तक आ गयी है कि कई बार बड़े शहरों में फ्लैट्स में लाशें कंकाल हो जाती हैं और किसी को पता ही नहीं चलता। बदलाव के इस दौर में पुरातन परम्पराएँ तक बदल गयी हैं, साधू-संत तक रस्मी प्रवचन देकर धत्कर्मो में लिप्त होने लगे हैं, ऐसा हो गया है कि भाग्य और परिस्थिति के सताए व्यक्ति को कहीं ठौर नहीं। सब जानते हैं विपत्ति जीवन का अनिवार्य हिस्सा है आज किसी पर आई है तो कल किसी और पर आयेगी। ऐसी विपत्ति में लोगों को त्यागने वाला समाज अपनी ही मौत की गारंटी शर्तिया ले रहा है।

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