The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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ब्रेकर के ज़रिए ठोकर खाते आप और हम

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सत्ता छोटी से छोटी चीज़ में भी चाह ले तो प्रभुता और लघुता का अहसास करा ही देती है। शायद सत्ता का चरित्र ही ऐसा है। सड़कों पर बने स्पीड ब्रेकर जैसे छोटे निर्माण में भी सत्ता की यह प्रवृत्ति झलक ही जाती है। जहाँ प्रभुओं की रिहाइश होती है वहाँ स्पीड ब्रेकर बनते हैं लेकिन लघु मानवों की बस्तियों और उन सड़कों पर जहां वे आमतौर पर चलते हैं, स्पीड ब्रेकर के नाम पर ठोकरें बना दी जाती हैं। सत्ता अपने अनुभव से जानती है कि ज़िन्दगी भर ठोकरें खाने का आदी आम आदमी रास्ते की ठोकरों को भी बिना शिकायत झेल जायेगा। बिना शक सत्ता की समझ सही है, हम और आप दोनों प्रभु वर्ग और आम आदमियों की बस्तियों में जाकर सत्ता की इस समझ को भी समझ सकते हैं। साथ ही यात्रा के दौरान नित्य की ठोकरें खाना तो हमारी – आप की नियति है ही।

आधुनिक जीवन शैली की उपलब्धि हैं ये ठोकरें। जब तक शहरों पर साइकिलों का साम्राज्य हुआ करता था और नाम मात्र की मोटर बाइक्स, स्कूटर और कारें हुआ करती थीं, सड़कों पर स्पीड ब्रेकर नहीं बनाए जाते थे, गाड़ियाँ कम होने की वजह से सड़कें भी चौड़ी दिखती थीं। लोग-बाग़ नियमों का भी पालन करते थे और कायदे से चलते थे इसलिए यातायात आमतौर पर सुगमता से संचालित हुआ करता था। कालांतर में लोगों को अपनी इस धीमी गति पर काफी अफ़सोस हुआ और उन्होंने अपनी रफ़्तार बढ़ानी शुरू कर दी। ज़ाहिर सी बात है इस नेक काम में और भी तमाम लोग जुट गए। सरकार ने खूब लाइसेंस बांटे और सड़कों पर बाइक्स और कारों की भरमार होने लगी। आरटीओ ऑफिस क्यों पीछे रहता? रफ़्तार किसको नहीं चाहिए, ऐसे में दलालों की मार्फ़त अँधाधुंध लाइसेंस मिलने लगे। गाड़ी चलाना कायदे से आता है या नहीं इसकी ज़रुरत नहीं रही। मान लिया गया कि जब गाड़ी है, तो आदमी चला तो लेगा ही।

रफ़्तार बढ़ने की जब शुरुआत हुई तो उसे नियंत्रित करने के लिए स्पीड ब्रेकर बनाए गए। एक निश्चित आकार और पैमाने से ये स्पीड ब्रेकर बनाए जाते हैं, ये दरअसल कैसे होते हैं, इन्हें वीआईपी इलाकों में जाकर देखा जा सकता है। स्पीड ब्रेकर जब बनने शुरू हुए तो यह सही है कि प्रभुता और लघुता का भेद नहीं किया गया, जहां भी बने स्पीड ब्रेकर ही बने। भेद काफी समय बाद शुरू हुआ। उसके कारण कई रहे, पहला तो आये दिन कोई न कोई विभाग सड़कें खोदने लगा और अब तो खैर यह प्रवृत्ति ही बन गयी है। विभागीय देखा देखी लोग भी जागरूक हुए और जब जहाँ मर्जी हुई सड़कें खोद डालीं और भी कई वजहें रहीं। ऐसे में जब जब सड़कें खुदीं स्पीड ब्रेकर भी टूटे तो फौरी तौर पर वहां ठोकरें बना दी गईं ताकि यातायात अनियंत्रित नहीं हो। बाद में उन जगहों पर फिर से स्पीड ब्रेकर बना दिए जाते थे। कुछ समय तक ये सिलसिला चला। उसके बाद कई वजहों से शहरों का प्रबंधन सम्भव नहीं रहा, तब से प्रभु वर्ग ने अपने लिए स्पीड ब्रेकर बनवाने शुरू किये और लघु मानवों को ठोकरों के हवाले किया। और भी तमाम काम हुए, जिनका ज़िक्र फिर कभी।

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