The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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शासकों की मानसिकता दर्शाती बटलर झील

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लखनऊ के दिल हज़रतगंज के पास ही बटलर पैलेस कॉलोनी है। इस कॉलोनी की कहानी दिलचस्प है। पहले कहानी सुनिए फिर मतलब की बात होगी। नवाबी दौर में महमूदाबाद अवध की बड़ी रियासत थी। अंग्रेजों का ज़माना था और तब उत्तर प्रदेश वजूद में नहीं था। जो आज का उत्तर प्रदेश है, लगभग उतना ही उस समय संयुक्त प्रान्त कहलाता था, एक समय उसके गवर्नर होते थे सर हरकोर्ट बटलर। महमूदाबाद के राजा साहब और बटलर साहब बड़े गहरे दोस्त थे, राजा साहब ने अपने दोस्त के लिए बतौर तोहफ़ा बटलर पैलेस का निर्माण कराया था। राजपूत और अवध वास्तुशिल्प के इस आलीशान पैलेस का इस्तेमाल राजा साहब और सर बटलर की दिलजोई के लिए होता था। उस समय यहाँ होने वाली पार्टियों में शामिल होने वालों का अलग ही जलवा होता था, ये वो लोग थे जो तब के संयुक्त प्रान्त के भाग्य विधाता थे।
बहरहाल जब बटलर पैलेस बन रहा था तो गुम्मे बनाने के लिए थोड़ी दूर पर ही एक जगह से मट्टी खोदी जाने लगी , पैलेस के पूरा होने तक इतनी मट्टी खोदी जा चुकी थी कि वहां एक बड़ा सा तालाब बन गया जो कालांतर में अन्दर ही अन्दर गोमती से जुड़ जाने की वजह से झील बन गया। ये काम हुआ तो इत्तिफाकन लेकिन बाद में इस झील ने बटलर पैलेस की शोभा को कई गुना बढ़ा दिया, राजा साहब ने झील को ख़ूबसूरती से सहेजा और इसका कई तरह से इस्तेमाल किया। व्यक्तियों की तरह संस्थाओं और भवनों वगैरह का भी भाग्य होता है, सो बटलर पैलेस और इस झील के भी खोटे दिन शुरू हुए।
भारत आज़ाद हुआ, संयुक्त प्रान्त उत्तर प्रदेश बना हाँ, लखनऊ पहले की तरह ही राजधानी बना रहा। आज़ादी के शुरुआती दौर की गहमागहमी में राज नेताओं और अफसरों में ललक थी कि कैसे उत्तर प्रदेश को खासा विकसित और सुन्दर प्रदेश बना दिया जाये, ऐसा हो सके इसके लिए उन्होंने अपने शासन और प्रबंधन कौशल का अनुकूलतम इस्तेमाल किया, इसके नतीजे भी मिले, तमाम नई संस्थाएं बनीं, स्कूल कॉलेज खुले, विश्वविद्यालय बने, खेती उन्नत हुई और भी कई काम हुए। लेकिन कालांतर में राजनीति ने ही इन सबका बेड़ा भी गर्क कर दिया। धर्म और जाति की राजनीति ने विकास को हाशिये पर ला दिया।
इतना ही नहीं राजनीति के इस दौर में योग्यता सबसे पीछे चली गई। हर जगह ऐसे लोग हावी हो गए जो जोड़-तोड़ और कट-बैठी में उस्ताद हैं लेकिन योग्यता में जीरो, ज़ाहिर सी बात है इनमें न तो शासन का कौशल है न ही प्रबन्धन का। इतना ही नहीं लगातार प्रपंच में जुटे रहने की वजह से कुछ नया और अच्छा करने की तरफ इनका ध्यान ही नहीं जाता। बदलाव के इस दौर में ही बटलर पैलेस के भाग्य ने भी पलटा खाया। पैलेस राजा साहब की बजाए राज्य सरकार का हो गया और इसकी खाली पड़ी जमीन पर नेताओं-अफसरों के रहने के लिए कॉलोनी बना दी गई, लेकिन पैलेस और झील को भाग्य भरोसे छोड़ दिया गया।
कॉलोनी बन गई और तमाम नेता – अफसर इसमें बस भी गए। गौर करें ये वही बदले दौर के कौशल शून्य नेता – अफसर हैं, तिकड़म ही जिनकी सबसे बड़ी योग्यता है। नतीजा भी सामने है उत्तर प्रदेश के भाग्य विधाता जहाँ रह रहे हैं, वहां की सड़कें गन्दी हैं, कूड़े के ढेर पटे पड़े हैं और गंदगी से बजबजाती, गंध मारती झील है। मज़े की बात कि जो लोग यहाँ रह रहे हैं उनके लिए कॉलोनी को सुन्दर बनाना दो मिनट का खेल है और अगर उनमें नागरिक और सौंदर्य बोध होता तो कॉलोनी के बीच की वह झील अपने सौंदर्य के लिए कम से कम उत्तर प्रदेश में तो प्रसिद्ध होती ही। उत्तर प्रदेश का हाल बेहाल क्यों है? क्यों लखनऊ नागरिक सुविधाओं के मामले में सबसे पिछले पायदान पर खड़ा है, बटलर पैलेस कॉलोनी और झील इन सारे क्यों का जवाब देती है। जो लोग अपने खुद के रहने कि जगह को नहीं संभाल सके, वो सूबे को क्या और कैसे संभालेंगे, बड़ी आसानी से समझा जा सकता है।

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