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मेरे विचार

सब लोगों से दोस्ती, सब लोगों से बैर

खुशवंत सिंह साहब का पहला उपन्यास जो मैंने पढ़ा, वो इत्तिफाकन पढ़ा। मैं उस समय बीए में पढ़ता था, क्राइस्ट चर्च कॉलेज कानपुर में। खुशवंत सिंह के कॉलम के हिन्दी अनुवाद, ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर का मैं नियमित पाठक था और वो अंग्रेजी के…

दुख तो देंगी ही परसंताप से बनी सरकारें

समाज में जब कोई परिवर्तन सतह पर दिखता है तो ये मान कर चलिए की उसकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी होती है, दिक्कत बस यही है कि पिछले करीब दो दशक से अपनी जड़ों से कट चुके बुद्धिजीवी उसे समझ नहीं पाते। इसलिए जब परिवर्तन हो चुका होता है तो वे उसकी…

लखनऊ की मलिका किश्वर की नज़ीर – पार्ट 2

इधर नवाब ने भी गद्दी छोड़ने से इंकार कर दिया। नतीजे में कंपनी ने अवध पर कब्जा कर लिया और नवाब को लखनऊ छोड़ कलकत्ते मटिया बुर्ज के लिए रवाना किया। उनकी पेंशन भी घटा कर 15 से 12 लाख रुपए सालाना कर दी गई। 13 फरवरी 1856 को नवाब वाजिद अली शाह…

लखनऊ की मलिका किश्वर की नज़ीर – पार्ट 1

उपनिवेश बाद का दौर था और यूरोप के तमाम देशों के अपने अपने उपनिवेश थे, जहां आजादी के लिए हिंसक संघर्ष हो रहे थे। ऐसे में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे बैरिस्टर मोहन दास करम चंद गांधी ने वहां पर आजादी का अहिंसक आंदोलन शुरू किया। वह दर असल प्रयोग था…

पिंक बूथ जैसा रहा योगी जी का कार्यकाल

हालांकि मेरी कोई हैसियत नहीं, लेकिन भारत का नागरिक और मतदाता तो हूं ही, इस नाते थोड़ा बहुत कुछ कहने का अधिकार फिलहाल तो मेरे पास है ही। जब योगी जी आए थे तो उसी अधिकार से मैंने कहा था की कम से कम छह माह तक योगी जी के कामकाज पर कोई टिप्पणी…

भक्तों के भगवान : भूत, भविष्य और वर्तमान

भक्तों के भगवान : भूत, भविष्य और वर्तमान  भक्तों के भगवान ने नोटबंदी और जीएसटी से न सिर्फ अर्थव्यवस्था का बाजा बजाया बल्कि स्विडिश बैंक में रखे काले धन को वापस लाने के लिए भी कुछ नहीं किया। 15 लाख को जुमला कह दिया गया। दूसरी ओर, कानून…

धंधा है, तो गन्दा भी होगा

बहुत पहले मेरे बचपने में दादी ने कोई मनौती मानी थी और वो पूरी हो गयी रही होगी तो पूरा परिवार तीर्थ यात्रा पर गया था| मै काफी छोटा था लेकिन मुझे पूरी तरह याद है वो यात्रा आनंददायक होने के साथ साथ खासी तकलीफदेह भी थी| रुकने के लिए सिर्फ…

वह मार्मिक दृश्य जिसे मैं भुला नहीं पाता

इस वाकये को गुज़रे अंदाज़न साल भर से ज्यादा तो हो ही चुके होंगे लेकिन आज भी यह जस का तस मुझे याद है। देसी कुत्ते–कुतिया हर जगह बहुतायत से मिलते हैं, जहां मैं रहता हूँ वहां भी काफी हैं। कुछ तीन–चार साल तक दिखाई देते हैं, ज्यादातर जन्म लेने के…

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