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समाज

भक्तों के भगवान : भूत, भविष्य और वर्तमान

भक्तों के भगवान : भूत, भविष्य और वर्तमान  भक्तों के भगवान ने नोटबंदी और जीएसटी से न सिर्फ अर्थव्यवस्था का बाजा बजाया बल्कि स्विडिश बैंक में रखे काले धन को वापस लाने के लिए भी कुछ नहीं किया। 15 लाख को जुमला कह दिया गया। दूसरी ओर, कानून…

Hatyari Laparwahi

Yaad rakhen ye aapradhik laaparwahi.. Is video ko zaroor dekhen aur bhavishya me kabhi bhi bhaavnaon me bahkar vote na karen.. Apni pahli hi sarkaar me Atal ne pension band kar di thi.. Aisi party ki sarkaar dubara aai ye hamari…

इस दुर्दशा का अंत नहीं

बोर्ड के एग्जाम शुरू हो चुके हैं। पहले ही दिन हिन्दी का पर्चा करीब दो लाख लड़के लड़कियों ने नहीं दिया। आजकल आकाशगामी बातों पर ज़ोर ज्यादा है सो ज़मीनी बातों पर लोग ज्यादा ध्यान नहीं देते। और फिर बात हिन्दी की हो तो ये मान लिया जाता है कि यह…

हर किसी को हर बार मूर्ख बनाना असम्भव

कहावत है कि किसी व्यक्ति को मूर्ख बनाना सम्भव है, कुछ लोगों को कई बार मूर्ख बनाना सम्भव है लेकिन हर किसी को हर बार मूर्ख बनाना असम्भव है। छोटी सी कहावत है सो छोटे लोगों को समझ में आ जाती है। लेकिन बड़े लोग अपने बड़प्पन के मद में शायद साधारण…

समझ में नहीं आतीं ये उलटबासियाँ

पिछले करीब दो दशक से देश की माली हालत ख़ासतौर से चर्चा का विषय होती है। इसमें कम से कम दो बातें साफ़-साफ़ समझ में आती हैं, एक तो साफ़ सुथरी अंग्रेज़ी में धीरे-धीरे बोलने वाले लोग बताते हैं कि माली हालात के नज़रिए से भारत अब दुनिया की ताकत बन चुका…

संस्कृति स्कूल सुधार पायेगा कार्य संस्कृति ?

जब अँगरेज़ हिंदुस्तान पर कब्ज़े के बाद यहाँ के शासन को व्यवस्थित करने में जुटे थे। उनकी अपनी प्राथमिकताएं थीं और तदनुसार वे संस्थाएं गढ़ रहे थे। आन्तरिक प्रशासन बनाए रखना और मालगुजारी इकठ्ठा करना...

सतरंगे मास्टरों की बदरंगी दास्तान

हम लोगों के बचपने में शिक्षा व्यवस्था बहुत सपाट सी हुआ करती थी मिडिल, इन्टर और यूनिवर्सिटी की पढ़ाई होती थी जिनको मास्टर, प्रवक्ता और प्रोफेसर साहब पढ़ाया करते थे। मास्टर बहुत ही आदरसूचक शब्द होता था जिसका मतलब हुआ मालिक यानी बच्चे को मालिक…

धंधा है, तो गन्दा भी होगा

बहुत पहले मेरे बचपने में दादी ने कोई मनौती मानी थी और वो पूरी हो गयी रही होगी तो पूरा परिवार तीर्थ यात्रा पर गया था| मै काफी छोटा था लेकिन मुझे पूरी तरह याद है वो यात्रा आनंददायक होने के साथ साथ खासी तकलीफदेह भी थी| रुकने के लिए सिर्फ…

लोहियाजी के सिद्धांतों की सद्गति

कुदरत का निजाम भी अजीब है, कोई चीज़ कितनी भी सुन्दर क्यों न हो कालान्तर में कुरूप हो जाती है। कुछ इसी तरह से ये भी है कि सिद्धान्त ज़्यादातर लोगों के कल्याण के लिए बेहतरीन बनाए जाते हैं लेकिन लागू होने के क्रम में वे बद से बदतरीन होते जाते…

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