The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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चिनार के पेड़ और जहाँगीर

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बहुत पहले पढ़ा था कि सम्राट जहांगीर को कश्मीर बेहद पसंद था इस हद तक कि उन्होंने कश्मीर को पृथ्वी का स्वर्ग बताया था बावजूद इसके जहांगीर ने स्वर्ग की शोभा को निखारने के लिए दो महत्वपूर्ण काम किये। चिनार के पेड़ तब भी कश्मीर में थे लेकिन सम्राट को लगा कश्मीर की आब-ओ-हवा के अनुरूप चिनार कश्मीर की पहचान बन सकते हैं। तब जहांगीर ने न सिर्फ वहां चिनार का सघन पौधरोपण कराया साथ ही वो पेड़ बनें ये भी सुनिश्चित कराया। आज चिनार कश्मीर की पहचान हैं और जानकार लोग इस बात के लिए सम्राट की आज तक प्रशंसा करते हैं। कश्मीर को सम्राट की दूसरी देन निशात बाग़ है, वो भी आज तक कश्मीर की खासियत है।

लेकिन पेड़ों के मामले में अपना लखनऊ कश्मीर सरीखा भाग्यशाली नहीं रहा। लखनऊ पुरानी बस्ती है, ये फिलहाल तो नहीं लेकिन अपने ज्ञात इतिहास से सन 1950-60 तक काफी हरा-भरा हुआ करता था। आसफुद्दौला ने जब लखनऊ को राजधानी बनाया तो बहुत सी वजहों से उन्होंने इमली के पेड़ को पसंद किया और यह सुनिश्चित किया कि लखनऊ के तब के राजमार्ग इमली के छतनार पेड़ों से हरे-भरे रहें। नवाबों के समय इमली के सघन पेड़ लखनऊ की एक पहचान हुआ करते थे।

1857 की लड़ाई के बाद अंग्रेजों ने नई सड़कें बनाने के नाम पर इन पेड़ों को अंधाधुंध काटा और उनके जाने के बाद नए अंग्रजों ने भी इस प्रक्रिया को बदस्तूर जारी रखा, नतीजे में आज की तारीख में पेड़ों को लेकर सिर्फ विधवा विलाप है और हर साल लाखों करोड़ों पौधे लगाने की घोषणाएं, जो पेड़ तो नहीं बनते हाँ, रुपये बनकर शायद नेताओं-अफसरों की जेबों में चले जाते हों। सभी राजा–महाराजा इमारतें बनवाते हैं और पेड़ लगवाते हैं तो अपने योगीजी फिर क्यों पीछे रहें सो उन्होंने भी अगले पंद्रह अगस्त तक प्रदेश में बाईस करोड़ पौधे लगाने का संकल्प लिया है।

मूलतः योगी हैं इसलिए मानना चाहिए पेड़-पौधों और हरियाली का महत्व समझाते होंगे इसलिए अगर वे 22 में से 11 करोड़ पौधों को भी पेड़ बना सकें तो साधुवाद के पात्र होंगे हालांकि ऐसा होगा यह मानना कठिन है, पहले के अनुभवों के आधार पर। फिर भी किसी व्यक्ति की शुभेच्छा पर शुरुआत में ही नकारात्मक राय देना ठीक नहीं। लेकिन क्या किया जाय जो हो चुका है उसके आधार पर दिल है कि मानता नहीं।

अब जब चर्चा चल ही गई है तो एक पुराने अंग्रेजों के ज़माने के क़ानून को याद करना नामुनासिब नहीं होगा। कानून है कि जितने पेड़ जो भी विभाग काटे उसी अनुपात में नए पौधे लगाकर उन्हें पेड़ बनाना सुनिश्चित करे। ज़ाहिर सी बात है अगर इस क़ानून का पालन हुआ होता तो आज के माननीयों को करोड़ों पौधे हर साल लगाकर पुण्य लूटने की नौबत ही नहीं आती।

साफ़ बात है ये सारा नाटक प्रचार और पैसे का खेल है जिसे सारी सरकारें और उनके अमले खुल कर खेलते हैं, खेल सुरक्षित भी है क्योकि पौधे बोलना नहीं जानते जो लूट की गवाही दे सकें। जब भी पौधे लगते हैं एक निश्चित अनुपात में सूखते भी हैं, सरकारें अगर ईमानदार होतीं तो साफ़-साफ़ बता देतीं कि इतने पौधे लगे इतने बड़े हुए और इतने सूख गए। उनका ये न करना ही चोरी की गवाही है।

इस वेबसाइट पर प्रकाशन के लिए आप भी अपनी रचनाएँ भेज सकते हैं। रचनाकारों को रचना(ओं) के लिए फिलहाल कोई भी भत्ता / शुल्क नहीं दिया जाएगा। अधिक जानकारी के लिए वेबसाइट स्वामी अनेहस शाश्वत से उनके मोबाइल +917521924486 पर प्रातः 11 से शाम 5 बजे के बीच सम्पर्क किया जा सकता है।

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