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कॉन्फेशन ऑफ ए ठग

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मेरे ऊपर अक्सर मित्रगण यह आरोप लगाकर हंसते हैं कि मैं हर घटना को इतिहास से जोड़ देता हूँ। लेकिन अब मैं क्या करूं कि इतिहास में मिलती हुई घटनाएँ याद आ जाती हैं। बुलंदशहर के जेवर के नजदीक हुई हत्या, लूट और बलात्कार की घटना के बाद एकाएक कॉन्फेशन ऑफ ए ठग नामक किताब की याद आ गई। उन्नीसवीं सदी में भारत में कई तरह के ठग गिरोह सक्रिय थे। लूट-पाट और हत्या- बलात्कार उनका पेशा था। देश पर उस समय कई ताकतें काबिज़ थीं लेकिन कोई भी इतनी शक्तिशाली नहीं थी कि उन ठगों को ख़त्म कर सकें। साथ ही तमाम तरह के सामजिक बदलावों से ऐसे लोग सामने आ गए थे जो जीवित रहने को कुछ भी कर डालते थे। ठग ऐसे ही लोग होते थे।

1835 में लॉर्ड विलियम बेंटिक भारत के गवर्नर जनरल बने तो उन्हें भारत में शांति बनाये रखने को नए कानूनों कि जरूरत महसूस हुई। बेंटिक ने कर्नल स्लीमन को ठगों को ख़त्म करने का जिम्मा दिया। साथ ही कहा कि ठगों को मारने के पहले उनसे बात करो। बातचीत से पता चलेगा किन वजहों से लोग ठग बने। ठगों की उसी बातचीत से बनी किताब का नाम है कॉन्फेशन ऑफ ए ठग। यही किताब कालान्तर में इंडियन पेनल कोड 1861 का आधार बनी साथ ही कई दूसरे प्रशासनिक सुधारों का भी आधार बनी, जिससे देश में लम्बे समय तक शांति रही। याद रहे तब से गंगा-यमुना में बहुत पानी बह गया लेकिन आज भी हमारी क़ानून-व्यवस्था का आधार 1861 का पीनल कोड ही है।

1947 में भारत आज़ाद हुआ और 1990 तक कमोबेश देश का सामजिक-आर्थिक पहले सरीखा ही स्थिर रहा। 1990 के बाद से एकाएक भारत को अमेरिका बनाने में सरकारें जुट गईं। अब अपना देश अमेरिका बना या नहीं ये तो नहीं मालूम क्योंकि मैं अमेरिका नहीं गया लेकिन जो दिख रहा है वह चिंताजनक है। ऐसे विरोधाभास सामने आ रहे हैं जो पहले कभी नहीं थे। अनाज के भंडार अकूत हैं लेकिन किसान मर रहे हैं। अरबपतियों की संख्या जिस तेज़ी से बढ़ रही है ग़रीबी उससे कई गुना अधिक तेज़ी से बढ रही है। शिक्षा का प्रसार जितनी तेज़ी से हो रहा है बौद्धिक अनपढ़ों की जमात उससे अधिक तेज़ी से बढ़ रही है। खुद सरकार का कहना है ये युवा किसी काम के नहीं जब भारत ग़रीब था सरकारें लोगों को पेंशन देती थीं। अब अमेरिका बन चुका भारत अपने नागरिकों को पेंशन नहीं देता। पक्की नौकरियों की जगह संविदा कर्मियों से काम चल रहा है। कारों और मोटर बाइक की संख्या इतनी बढ़ गई है की सड़कें कम पड़ रही हैं। दूसरी तरफ सड़कों पर पूड़ी के ठेलों की भरमार है जो एक बड़ी आबादी की भूख मिटाने का आधार है।

जाहिर है जिस देश में इतनी तेज़ी से सामाजिक-आर्थिक बदलाव हो रहे हों वहां बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी होंगे जो जीवन की दौड़ में पीछे हो जाएँ। ऐसे लोग कुछ भी कर सकते हैं। इनसे निपटने को एक अलग अपराध संहिता तो चाहिए ही, नए सामजिक-प्रशासनिक सुधार भी चाहिए, जो होते नहीं दिख रहे। राम-राम का जयकारा लगाने वालों के बस का ये है भी नहीं, साथ ही कुनबे और जाति की राजनीति करने वालों के बस का भी नहीं। ऐसे में यह कड़वी सच्चाई है कि अभी और कई जेवर सामने आयेंगे। अंग्रेजों ने तो ये भी किया था कई अपराधी जातियों पर लगातार निगरानी रखी जाती थी। उससे भी अपराध घटाने में मदद मिलती थी। अब शायद ये काम राम-राम जपने से हो जाए।

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