- Advertisement -

- Advertisement -

देश में लोकतंत्र और वंशवाद का अनूठा दौर

0 1,626

अपने देश में लोकतंत्र का फिलहाल जो मॉडल चल रहा है, वो इंग्लैंड और फ्रांस की देन है। हमारे संविधान का मूल ड्राफ्ट इंग्लैंड की देखरेख में 1935 में ही बनने लगा था, जिसे आजादी के बाद पूरा कर 1950 में 26 जनवरी को राष्ट्र को समर्पित कर दिया गया। स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने के कारण स्वाभाविक रूप से जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस ने देश की सत्ता संभाली और तीन आम चुनाव नेहरूजी के नेतृत्व में ही लड़े गए। विपक्ष की जैसी भी और जो भी हैसियत उस समय थी, उसने भी चुनाव में भरपूर हिस्सा लिया और कई जगहों पर जोरदारी के साथ जीता भी।

भारतीय लोकतंत्र का यह पहला अपेक्षाकृत शांत दौर उनके जीवन काल तक चला। उनकी मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री के अल्पकालिक दौर में भी भारतीय लोकतंत्र की गति स्थिर ही रही। हालांकि वंशवाद के लक्षण थोड़े बहुत उसी समय से उभरने लगे, सत्तारूढ़ दल होने के स्वाभाविक रूप से कांग्रेस में, क्योंकि लाभ वहीं मिलना था, फिर भी यह काम शालीन तरीके से हो रहा था, आजकल के तरीके से सारे ही दलों में डंके की चोट पर चल रहे वंशवाद की तरह से नहीं।

शास्त्री जी के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो यह आरोप पहली बार खुलेतौर पर लगा कि वे वंशवाद के चलते प्रधानमंत्री बनीं। लेकिन यह सिर्फ आरोप था, तत्कालीन बहुत से धुरंधर कांग्रेस नेताओं के विरोध के बीच तब के दक्षिण भारत के अतिशय प्रभावशाली नेता कामराज नाडार ने अपना समर्थन उन्हें दिया, तब वह प्रधानमंत्री बन सकीं। नेहरू की पुत्री होने का कोई लाभ उन्हें नहीं मिला। बकवास करने से कोई किसी को रोक नहीं सकता, लेकिन तब के दस्तावेज़ यही बताते हैं।

शरुआत मे गूंगी गुड़िया कही जाने वाली इंदिरा गांधी ने वैश्विक नेता बनने के क्रम में बहुत संघर्ष किया, इसे बताने की ज़रूरत नहीं क्योंकि जो भी पढ़ा लिखा है इसे जानता है, यह कहने में कोई हिचक नहीं कि आज भारत में जो कुछ भी अच्छा है इंदिरा जी की देन है। हालांकि गलती इन्सान से होती है इंदिरा जी से भी हुई। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को कुचलने के लिए उन्होंने इमर्जेंसी लगाई। हालांकि इसकी भी दो कहानियां हैं, कुछ का कहना है यह संजय गांधी ने लगवाई कुछ का कहना है जय प्रकाश नारायण के पीछे सक्रिय आरएसएस को कुचलने के लिए आपातकाल लगाया गया।

सच जो भी हो लेकिन यह भी उस समय की सच्चाई है कि इंदिरा गांधी के पुत्र होने के नाते संजय उस समय एक संविधानेतर सत्ता के केन्द्र थे। हालांकि 1977 में हुई हार का दंश भी इंदिरा और संजय दोनों ने झेला और 1980 में इंदिरा की वापसी में भी संजय का बड़ा योगदान रहा। इंदिरा जी चूंकि योग्य प्रधानमंत्री थीं, इसलिए विपक्ष उन पर व्यक्तिगत आरोप बहुत लगाता था। वंशवाद, चोरी चकारी और झूठ बोलने व बेईमानी करने के आरोप उन पर लगते थे। बहरहाल संजय और इंदिरा जी की मृत्यु के बाद राजीव प्रधान मंत्री बने। इस सत्ता रोहन को वंशवादी कहा जा सकता है लेकिन भारतीय लोकतंत्र की शक्ति ने पांच साल बाद राजीव से गद्दी वापस ले ली।

अब यहां से शुरू हुआ भारतीय लोकतंत्र का तीसरा दौर, सत्ता अब नीतियों के बखान के बजाय मंडल और मंदिर के जयघोष से प्राप्त की जाने लगी, लेकिन माध्यम चुनाव ही रहा और शक्ति का केन्द्र संविधान। हां, एक चीज़ ज़रूर हुई, अस्थिर सरकारों के इस दौर में जो आरोप इंदिरा जी पर लगते थे, वे आरोप सभी दलों ने एक दूसरे पर लगाए और सत्ता में रहने की वजह से सभी दलों में वंशवाद ने पैर पसारे। अब आरोप चाहे जो लगें सभी दलों में वंशवादी नेता है, कई को जनता ने मान दिया है और कई को नकार चुकी है। लेकिन वंशवाद भारतीय लोकतंत्र की फिलहाल सच्चाई है। यहां तक कि राजनीति के अजात शत्रु बोले जाने वाले अटल बिहारी वाजपेई पर भी अपने दामाद को प्रश्रय देने के आरोप लगे।

भारतीय लोकतंत्र के इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी पहली बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने। स्वाभाविक रूप से उन पर भी आरोप लगे। निश्चित रूप से मोदी का कार्यकाल विवादास्पद है और उन पर गम्भीर आरोप लगते रहे हैं लेकिन कुल मिला कर देखा जाए तो चुनावी राजनीति और संविधान की सत्ता से परे जाकर मोदी कुछ नहीं कर पाए है। हां, चुनावी राजनीति और संविधानिक सत्ता के अपने प्रति अनुकूलन के लिए उन्होंने हथकंडे ज़रूर अपनाए हैं, तो वो किस प्रधानमंत्री ने नहीं अपनाए? हां, किसी ने थोड़े कम तो किसी ने ज्यादा। फर्क सिर्फ इतना होगा की हथकंडे अपनाने के बावजूद कौन प्रधानमंत्री कितना योग्य रहा, लेकिन इसका आकलन इतिहास करेगा, जो एक सतत प्रक्रिया है। और अंत में अच्छा हो या बुरा वंशवाद भारतीय लोकतंत्र का फिलहाल स्थापित तथ्य है और ये वंशवादी नेता ही सत्ता से मुठभेड़ कर रहे हैं, अगर वे सफल रहे तो वे वंशवादी नहीं जमीनी नेता कहलाएंगे। हां एक बात और, चुनावी राजनीति की बाध्यता के बावजूद भारतीय समाज फिलहाल प्रभु वर्ग और शासित वर्ग में बंट चुका है, वंशवाद बढ़ने की शायद यह भी एक बड़ी वजह हो।

(अन्य खबरों के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें। आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं। अगर आप इन्स्टाग्राम इस्तेमाल करते हैं तो हमसे जुड़ें। लेटैस्ट अपडेट के लिए हमारा टेलीग्राम चैनल ज्वाइन करें।)
You might also like
Comments
Loading...

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More