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धंधा है, तो गन्दा भी होगा

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बहुत पहले मेरे बचपने में दादी ने कोई मनौती मानी थी और वो पूरी हो गयी रही होगी तो पूरा परिवार तीर्थ यात्रा पर गया था| मै काफी छोटा था लेकिन मुझे पूरी तरह याद है वो यात्रा आनंददायक होने के साथ साथ खासी तकलीफदेह भी थी| रुकने के लिए सिर्फ धर्मशालाएं थीं या फिर रिश्तेदारों के मकान और खाने के लिए कच्चे खाने के साधारण होटल या फिर पूड़ी–तरकारी की दुकाने, छोटे तीर्थ स्थानों पर वो भी नहीं|
मुझे याद है घूमते–फिरते जब हम लोग राधारानी के गाँव बरसाना पहुंचे तो दोपहर का समय हो चुका था और सबको कस कर भूख लगी थी| पिताजी ने पता किया तो लोगों ने बताया कि एक हलवाई है, आप कहेंगे तो वो पूड़ी–तरकारी बना देगा, इसके अलावा यहाँ पर खाने–पीने की और कोई व्यवस्था नहीं हैं|
खैर साहब हलवाई मिला, हम लोग भूख से कुनमुनाते उसकी दूकान पर बैठे रहे, उसने आधे घंटे में ताज़ी पूड़ी–तरकारी बनाई और बड़े प्रेम से आग्रह करके खिलाई| पैसे लेना तो उसकी व्यावसायिक मजबूरी थी लेकिन आग्रह करके प्रेम से खिलाना उसका मानवीय पहलू था| एक–दो बड़े आश्रमों में भी जाना हुआ वहां भी न्यूनतम सुविधाओं के अलावा और कुछ नहीं था| संत-महात्मा जो भी मिले उनकी बहुत ज्यादा दिलचस्पी लोगों से बातचीत करने में नहीं थी|
इस उदासीन माहौल के अपवाद केवल मंदिर और घाट थे जहाँ पण्डे लूटने के चक्कर में रहते थे लेकिन सच यह भी है कि वे बहुत-कुछ नहीं पाते थे क्योंकि अधिकाँश श्रद्धालु भी दलिद्र ही होते थे| उस समय लोगों के पास पैसे होते भी नहीं थे और यह भी मानसिकता थी कि लोग तीर्थ करने आये हैं पिकनिक मनाने नहीं इसलिए न्यूनतम सुविधाएं काफी हैं|
करीब तीन दशक पहले जबसे अर्थव्यवस्था में पैसे की आमद बढ़ी, धंधे ने धर्म की ओर भी पैर पसारे, ग्राहकों की विशाल संख्या पहले से ही थी जो अब अपेक्षाकृत संपन्न थे और तीर्थयात्रा के साथ ही पिकनिक का आनंद भी लेना चाहते थे| जब कुछ था ही नहीं तो वैराग्य था, जब माया आई तो बहुत से बैरागी, मालिक और मैनेजर बन गए, उन्होंने धंधे की कमान संभाली और तीर्थ यात्रियों सह पर्यटकों को सारी इच्छित सुविधा मुहैय्या की|
धर्म जब धंधा बन गया तो उसमे पैसा लगाने वाले भी आये, साथ ही वो सारी अच्छाई और बुराई भी आई जो किसी भी बड़े धंधे में होती है| अतिथि सत्कार से लेकर भयादोहन तक सब अब इस धंधे के अनिवार्य हिस्से हैं, जिनकी कमान संत महंतों से लेकर बड़े व्यापारियों और राजनीतिज्ञों के हाथ में है| नतीजे में आज की तारीख में धर्म जनित धंधा, रोजगार पाने का बड़ा अवसर देता है और लोग इस अवसर का लाभ उठाते भी हैं| बेरोजगारी के इस दौर में धर्म के अतिशय बढ़ते प्रभाव का एक कारण शायद ये भी हो|
मुझे नहीं मालुम स्वामी चिन्मयानन्द और उनकी शिष्या ने क्या किया या क्या नहीं किया| लेकिन ये मुझे ज़रूर मालुम है कि धर्म अब जब बड़ी मात्रा में रोजगार देने वाला धंधा बन चुका है तो अभी स्वामी चिन्मयानन्द और उनकी शिष्या जैसे कई और अभियुक्त सामने आयेंगे, ये धार्मिक धंधे के आर्थिक अभियुक्त हैं, इस गन्दगी को इस धंधे की अनिवार्य नियति मान संतोष करें|

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