The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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बच्चों को शिक्षा कम फ़िक्स्ड डिपॉज़िट ज़्यादा दें

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अभी कुछ दिन पहले एक बड़े अखबार में सर्वे आया था। अमेरिका के युवाओं की बाबत। सर्वे इस बात पर था कि अमेरिका में शैक्षिक ऋण और इस ऋण से हुई पढ़ाई के बाद रोजगार की क्या हालत है। अमेरिका जैसे अतिशय सम्पन्न देश में सर्वे में शामिल युवाओं में से एक चौथाई का मानना था कि वे इस ऋण के जंजाल से बाहर आने के लिए अपनी किडनी तक बेचने को तैयार हैं क्योंकि निरन्तर रोजगार का भरोसा अब नहीं रहा। इस सर्वे को पढ़ने के बाद तत्काल मुझे बहुत पहले खुशवंत सिंह साहब का लिखा एक लेख याद आया जिसमें उन्होंने लिखा था यूरोप और अमेरिका में कई बार पढ़ाई इतनी मंहगी हो जाती है कि कालांतर में सामान्य विद्यार्थी उतना भी नहीं कमा पाते जितना उनकी पढ़ाई पर खर्च हुआ।

खुशवंत सिंह साहब का करीब 20 साल पहले आया यह लेख और कुछ ही दिन पहले आया सर्वे यह बताने के लिए पर्याप्त है कि मंहगी और ऋण लेकर की जाने वाली पढ़ाई सफलता और सम्पन्नता की गारन्टी नहीं। खास तौर से अस्थिर रोजगार के इस दौर में। भारत में शिक्षा का जो वर्तमान ढांचा है वह अंग्रजों की देन है। आजाद हिन्दुस्तान में अंग्रेजों को गाली देने का चलन है। हालांकि अंग्रेजों ने जो भी संस्थाएं बनायी, आजाद हिन्दुस्तान आज भी उन्हीं के सहारे चलाया जा रहा है। इतना ही नहीं बहुत ही संस्थाओं को तो आजाद भारत में नष्ट भी कर दिया गया। लेकिन उनकी जगह कोई माकूल और समयोचित संस्था हमारे यहां के हुक्मरान नहीं बना पाये। शिक्षा की व्यवस्था भी ऐसी ही एक व्यवस्था है जिसे आजाद भारत में पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है। प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक में अज्ञान और अव्यवस्था का बोलबाला है। तभी अन्तर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय सर्वेक्षण के तहत शिक्षित युवा रोजगार के मानकों पर खरे नहीं उतरते।

बहरहाल बात देश के वर्तमान शैक्षिक ढांचे की हो रही है जो अंग्रेजों ने बनाया। अंग्रेज अपने मकसद में कामयाब थे। इस शिक्षा ने निचले स्तर पर क्लर्क पैदा किये और उच्च स्तर पर आईसीएस जिन्होंने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को मजबूती से चलाया। फिर आयी भारतीय व्यवस्था जिसने बतौर प्रसिद्ध लेखक श्रीलाल शुक्ल शिक्षा व्यवस्था को रास्ते की कुतिया की तरह समझा। समय-समय पर गठित शिक्षा कमेटियों ने कुतिया को लात लगायी और चलती बनी। क्रमश: शिक्षा व्यवस्था का भी आधुनिकीकरण हुआ और इस प्रक्रिया में शिक्षा पूरी तरह से अयोग्य और भ्रष्ट हांथों में चली गयी। भ्रष्ट तंत्र ने इस सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का गला काट डाला। नतीजे में आज चपरासी और सफाई कर्मी के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त युवक-युवतियां लाइन लगाये खडे़ हैं। बात कड़वी जरूर है लेकिन यह सच है कि भ्रष्ट तंत्र ने इन युवाओं के हाथ में उच्च शिक्षा की डिग्रियां भले थमा दी हों, लेकिन उनकी योग्यता और देश का वातावरण इन युवाओं को चपरासी और सफाई कर्मी बनने का ही अवसर दे सकते हैं।

इस भ्रष्ट तंत्र के झांसे की पोल अब लगभग पूरी तरह खुल चली है, जब कर्ज लेकर या पारिवारिक लाखों रुपये खर्च कर पढ़ने वाले लाखों बेरोजगार नोएडा और बेंगलोर में दस हजार महीने की नौकरी के लिए भगदड़ मचाए हुए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में सम्पन्न तबके के युवाओं के लिए तो फिर भी आस बची है फिर भी उनके माता-पिता उनके लिए रास्ता हमवार कर देंगे, लेकिन सामान्य तबके के युवाओं का हाल बेहाल है। बावजूद इसके अब व्यवस्था में नया चारा फेंका है कि विदेशी यूनिवर्सिटी के कैम्पस जब यहां खुलेंगे तो वहां से पढ़ने के बाद युवाओं को सुनहरा नहीं बल्कि हीरे जैसा चमकने वाला भविष्य मिलने से कोई नहीं रोक सकता।

ऐसे में अब समय आ गया है जीवन के कुछ पहलुओं पर एकदम नये सिरे से विचार किया जाये। इस भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को उच्च शिक्षा देने के बजाय उन्हें सामान्य शिक्षा दिलायें ताकि वे जीवन को सुगमतापूर्वक जी सकें और उनकी तथाकथित उच्च शिक्षा पर लाखों रुपये फूंकने के बजाए वे रुपया बच्चों के नाम जमा करते चलें। ऐसे में 25 साल की उम्र में सामान्य शिक्षित लेकिन 50 लाख रुपयों का स्वामी एक सामान्य युवा उस युवा से बेहतर होगा जो भारी-भरकम डिग्री के साथ नोएडा और बेंगलौर में दस हजार की नौकरी के लिए मोहताज हैं। सम्पन्न और समर्थ हालांकि सामान्य शिक्षित युवा मां-बाप के बुढ़ापे के लिए भी वरदान साबित होंगे। हां बस एक काम करना होगा कि उस धन का उचित प्रबन्धन अनुभवी मां-बाप अपने युवा पुत्र-पुत्रियों को करना सिखाएं। आज की व्यवस्था में एक सामान्य युवा को उच्च शिक्षा दिलाने की बजाए यह कदम उठाना शायद ऐसे युवाओं को बेहतर, सुरक्शित और स्थायी जीवन देने में ज्यादा सफल होगा।

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