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दुख तो देंगी ही परसंताप से बनी सरकारें

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समाज में जब कोई परिवर्तन सतह पर दिखता है तो ये मान कर चलिए की उसकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी होती है, दिक्कत बस यही है कि पिछले करीब दो दशक से अपनी जड़ों से कट चुके बुद्धिजीवी उसे समझ नहीं पाते। इसलिए जब परिवर्तन हो चुका होता है तो वे उसकी आधी अधूरी व्याख्या करने की कोशिश करते हैं, यही समझ लें कि मैं भी यही करने की कोशिश कर रहा हूं।

चलिए शुरुआत करते हैं 1947 से जब भारत आजाद हुआ। इस आजादी के लिए कई विचारों के साथ लड़ाई लड़ी गई लेकिन समग्रता में अगुआई कांग्रेस के ही हाथ में रही, नतीजे में स्वतंत्र देश की कमान भी उसी के हाथ में आई और नए संविधान के साथ काम शुरू हुआ।

आज की पीढ़ी इस बात को नहीं समझेगी लेकिन राजे रजवाड़ों और जमींदारी को खत्म कर कांग्रेस ने भारतीय समाज की हजारों साल पुरानी यथास्थिति को एक झटके में खत्म कर दिया। रही सही कसर मताधिकार और संविधान में उल्लिखित समानता के अधिकार ने पूरी कर दी। अब कानूनी तौर पर कुलीन तंत्र समाप्त हो चुका था और नए तौर पर भारतीय समाज को गढ़ने की तैयारी थी।

नए भारत की परिकल्पना और प्रत्याशा में विशेषाधिकार से वंचित वर्गों ने इस बदलाव का बहुत विरोध भी नहीं किया। यह इससे भी जाहिर है कि तब के कुलीन तंत्र की आवाज उठाने वाले जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी जैसे संगठनों की कहीं कोई पूछ नहीं थी। मोटे तौर पर एक काम और भी हुआ कुलीन तबके का एक उदार तबका समाजवादी धड़े के साथ आया और वंचित तबके के कल्याण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की।

यह दौर मोटे तौर पर जवाहर लाल नेहरू के जीवन काल तक चला। इस अवधि में आज की भाषा में कहें तो पिछड़ों और दलितों का एक संपन्न तबका तैयार हुआ जिसने 1967 के चुनाव में अपनी आमद दर्ज कराई और नौ राज्यों में पहली बार गैर कांग्रेस सरकारें बनी। तब तक इंदिरा गांधी का काल शुरू हो चुका था जो शुद्ध राजनीतिज्ञ थीं और उनका ध्यान कांग्रेस को सत्ता में बनाए रखना था।

उनके व्यक्तित्व में करिश्मा भी था, नतीजे में करीब दो दशक तक और उन्होंने यथास्थिति बनाए रखने में सफलता पाई और इस शांतिपूर्ण समय का उपयोग उन्होंने देश को समृद्ध बनाने में किया। आपातकाल ज़रूर अपवाद रहा लेकिन वो श्रीमती गांधी की विराट उपलब्धियों के सामने भुलाया जा सकता है।

सुनने में कड़वा जरूर है लेकिन इंदिरा गांधी की मृत्यु के साथ ही राष्ट्रव्यापी नेतृत्व और काफी हद तक सिद्धांत की राजनीति का युग समाप्त हुआ। नतीजे में समाज में बिखराव और किसी भी तरह से सत्ता हासिल करने की प्रवृत्ति शुरू हुई। शुरुआत शाहबानो प्रकरण और राम मंदिर का ताला खुलवाने से हुई।

फिर आए विश्वनाथ प्रताप सिंह जो बोफोर्स कांड से शुरू होकर मंडल कमीशन की रिपोर्ट पर खत्म हुए और नतीजे में 11 महीने के प्रधानमंत्री बने। हालांकि उनके लोगों ने सत्ता संधान में उनकी एक बात नहीं मानी वरना शायद स्थिति कुछ और होती, मंडल के बाद बनी राज्य सरकारों में से एक या दो में वीपी सिंह दलित मुख्यमंत्री चाहते थे, बहरहाल।

दूसरी तरफ राज्यों में बनी पिछड़ों की सरकारों ने वो बड़प्पन और विशाल हृदय नहीं दिखाया जो सरकारों से अपेक्षित होता है। मोटे तौर पर ये कुछ जातियों की सरकारें बन कर रह गईं, जिन्होंने मुसलमानों के वोट पाने के लिए हल्ला ज्यादा मचाया हालांकि उन्हें कुछ खास दिया नहीं।

देखा जाए तो यही वह प्रस्थान बिन्दु है जहां से परसंताप की राजनीति शुरू हुई। उदारता के बदले जब संकुचित रवैया मिला तो सवर्ण जातियों ने भी लामबंद होना शुरू किया, एक सुविधा उन्हें पहले से हासिल है, भूमि, संपत्ति और शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें पहले से बढ़त हासिल है।

कांग्रेस कई वजहों से सिमट चुकी थी सो सवर्ण जातियां भाजपा के साथ लामबंद हुईं और साथ में वो असंतुष्ट पिछड़े भी जिन्हें अपनों के राज्य में सम्मान नहीं मिला था। कांग्रेस भी इस स्थिति का फायदा उठा सकती थी, सोनिया मनमोहन की जोड़ी आर्थिक मोर्चे पर तो सक्रिय थी लेकिन ध्वस्त संगठन के चलते सतह के बदलाव से वे नावाकिफ और असहाय थे।

राम मंदिर मुद्दे की फसल से भाजपा पहले से ही मालामाल थी, सवर्णों के परसंताप ने उसे और धनी साथ में शक्तिशाली बना दिया। साथ ही संघ भी किसी भी तरह सत्ता पाने की मानसिकता में आ चुका था। जो कमी थी वो कुशल वक्ता और घाघ नेता नरेंद्र मोदी और उनके दोस्तों अंबानी और अदानी ने पूरी कर दी।

जाहिर है भाजपा को अब सत्ता में आना था और वो आ भी गई। लेकिन जिन अंतर्विरोधों को साध कर भाजपा सत्ता में आई वो उसके सत्ता में आने के साथ ही मुखर होने लगे। भारत समेत सारे विश्व की अर्थनीति का मूल औपनिवेशिक काल में है और फिलहाल आपस में जुड़ा है, लेकिन संघ और भाजपा का इससे लेना-देना नहीं, नतीजे में अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी।

दूसरी तरफ वे धनकुबेर भी सक्रिय हो गए जिनके धन से भाजपा सत्ता में आई। घाघ नेता मोदी भी शायद जानते ही होंगे कि वास्तविकता क्या है सो उन्होंने अपनों को पूरी तरह से उपकृत करना शुरू किया। शासन में भाजपा की कमी की एक वजह शायद ये भी हो की ज्यादातर समय तो अंतर्विरोधों को साध कर लच्छेदार भाषण से उन्हें छिपाने में ही जा रहा है। बावजूद इस सबके मोदी के पहले कार्यकाल में कुल मिलाकर स्थिति काबू में ही रही।

नतीजे में सवर्णों के परसंताप और राम मंदिर ने उन्हें दूसरा कार्यकाल दिया। इसी से उपजे अति आत्मविश्वास ने दूसरे कार्यकाल में बदहाली का रास्ता तैयार कर दिया। लगभग सारे मोर्चे पर ध्वस्त मोदी सरकार को अब सिर्फ सवर्ण परसंताप और हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे का सहारा बचा है।

हालांकि दिखाई ये भी दे रहा है कि सारे ही वर्गों से इस फैक्ट को समझने वाले लोग भी सामने आने लगे हैं, अगर वे सफल होते हैं तो ये शुभ लक्षण होंगे और लोकतंत्र पर चलकर भारतीय राष्ट्र राज्य और उन्नति करेगा, जैसी कि भारत के संविधान में परिकल्पना की गई है, अगर ऐसा नहीं होता है तब तो फिर भगवान राम मालिक है ही।

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