The Golden Talk
by Anehas Shashwat

- Advertisement -

- Advertisement -

एक सजावटी मंत्री की उदास मृत्यु

0 892

आमतौर पर मैं ऐसे विषयों पर नहीं लिखता, लेकिन कभी-कभी नियम तोड़ना चाहिए। अपने यहाँ परंपरा है, मृत्यु के बाद किसी की कमियों या दुष्टता पर चर्चा नहीं की जाती। उसके बारे में सब कुछ अच्छा-अच्छा ही बोलने का रिवाज़ है। लेकिन पश्चिमी सभ्यता में ऐसा नहीं है, वहां किसी व्यक्ति और उसमें भी सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके व्यक्तित्व के सम्यक मूल्यांकन की परम्परा है, ऐसा इसलिए ताकि भविष्य के लिए सनद रहे और आगे आने वाले व्यक्ति अपने व्यक्तित्व निर्माण में उससे सीख ले सकें।
हर व्यक्ति में अच्छाई और बुराई दोनों होती है, जिन परिस्थितियों से वो गुजरता है, उनसे उस व्यक्ति का व्यक्तित्व परवान चढ़ता है जो अच्छाई–बुराई दोनों का सम्मिश्रण होता है। ऐसे में कोई व्यक्ति केवल अच्छा या केवल बुरा हो ही नहीं सकता। इसलिए ये मानना चाहिए कि व्यक्तित्व के मूल्यांकन की पश्चिमी परम्परा हमारी परम्परा से कहीं ज्यादा तार्किक है।
अरुण जेटली के बारे में मेरी जानकारी बहुत ज्यादा नहीं है। राज्यसभा में जब वो वक्तव्य देते थे तब मेरा ध्यान उन पर गया। बहुत नफीस लेकिन सरल अंग्रेज़ी में बहुत ही सारगर्भित तरीके से अपनी बातें कहते थे। वक्ता के तौर पर उनसे बीस मैंने सुषमा स्वराज को ही पाया। उनके भाषण सुनने के बाद मैंने थोड़ी बहुत जानकारी उनके बारे में ली तो पता चला वे मैदान के खिलाड़ी कम परदे के पीछे के सूत्रधार ज्यादा थे। इसे उनके व्यक्तित्व का कमतर हिस्सा कह सकते हैं, लेकिन उनकी योग्यता के मूल्यांकन का पैमाना नहीं। बहरहाल एक बेहद सफल वकील तो वे थे ही, राजनीति में भी क्रम से एक–एक सीढ़ी चढ़ते हुए वे केंद्रीय वित्त मंत्री की महत्वपूर्ण कुर्सी तक पहुंचे। बस यही वो प्वाइंट था जहाँ से उनका सौभाग्य अस्त हो गया।
वे वित्तमंत्री तो पूरे समय रहे लेकिन शायद ही कोई महत्वपूर्ण फैसला उनके खाते में गया हो। नोटबंदी के फैसले की भनक शायद ही उन्हें थी और दूसरे बड़े जीएसटीएन के फैसले में भी उनकी भूमिका नगण्य थी।
उनकी मृत्यु के बाद जो मीडिया भारतीय परम्परा का निर्वहन करते हुए जेटली को तमाम बड़े फैसले करने का क्रेडिट दे रहा है, उनके जीवित रहते उनकी लाचारगी की खिल्ली उड़ाने का एक भी मौका नहीं चूकता था।
कुल मिलाकर देखा जाए तो अरुण जेटली एक योग्य, भद्र लेकिन दुर्भाग्यशाली व्यक्ति थे। उनकी सेहत ने भी उनका साथ नहीं दिया और जब वे अपने राजनैतिक जीवन के शीर्ष पर पहुंचे तो जिस योग्यता की बदौलत जेटली शीर्ष पर पहुंचे थे वो अप्रासंगिक हो चुकी थी, उसके बाद वे केवल वरिष्ठता की वजह से सजावटी वित्तमंत्री बने रहे जो केवल अपनी बीमारी और लाचारी की वजह से बीच-बीच में चर्चा का विषय बनते थे।
सुषमा स्वराज से अगर जेटली की तुलना की जाए तो यह अनुचित नहीं होगा। भाजपा दोबारा शासन में आई इसकी पृष्ठभूमि तैयार करने में जेटली और स्वराज दोनों की अहम् भूमिका थी लेकिन जब अवसर आया तो ये दोनों महारथी, विरथ कर शोभा की वस्तु बना दिए गए। उनकी योग्यता का सर्वाधिक फायदा जब मिल सकता था, उस समय वे अप्रासंगिक थे। ऐसे में यह कहना शायद गैरमुनासिब नहीं होगा कि जेटली और स्वराज की मृत्यु भले अभी हुई हो, वे अस्त बहुत पहले हो चुके थे।

Comments
Loading...