The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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बुखार को पहचानें, वर्ना फैल जाएगी महामारी

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पहले काफी चलन में रही दीवार घड़ी के पेंडुलम की तरह, विपरीत ध्रुवों वाली, पुलिस विभाग से सम्बंधित दो ख़ास ख़बरें इधर हाल ही में आईं। एक बहुत चर्चित हुई, दूसरी की कोई चर्चा ही नहीं हुई, जबकि दोनों ही घटनाएं पुलिस विभाग में फैल रहे बुखार की सूचना देने वाली रहीं। आप लोग शायद जानते भी होंगे कि बुखार दरअसल कोई रोग नहीं होता, शरीर बुखार के माध्यम से सूचना देता है कि उसके अन्दर कोई रोग घर कर गया है, जिसके इलाज की ज़रुरत है। तो बुखार रुपी पहली घटना विवेक तिवारी काण्ड रही, जिसने भूचाल सा ला दिया। जबकि उसी दिन बाराबंकी में एक महिला कांस्टेबल फांसी लगाकर मर गई, जिसका संज्ञान शायद ही किसी ने लिया हो। इसी तरह हरदोई में भी एक कांस्टेबल ने आत्महत्या कर ली।

बाराबंकी वाली कांस्टेबल ने तो अपनी आत्महत्या की वजहें लिख दी थीं कि उत्पीड़न कि वजह से वह आत्महत्या को मजबूर हो रही है लेकिन हरदोई वाले की आत्महत्या की वजह सार्वजनिक नहीं हुई है, शायद उसके सहकर्मी जानते होंगे। दरअसल पुलिस विभाग में समस्याओं के दो स्तर हैं, अफसरों की दुश्वारियां अलग तरह की हैं और निचले स्टाफ की अलग तरह की। एक हथियारबंद संगठन होने के नाते पुलिस वालों पर आंतरिक अनुशासन कुछ ज्यादा ही है और वे कमोबेश इसका पालन भी करते हैं। ऑफिसर काडर ज्यादा ताकतवर होता है, इसलिए एक तो अपनी दुश्वारियों पर वो मुखर होता है और उनका हल खोजने में भी समर्थ होता है, जबकि निचले काडर के साथ ऐसा नहीं है। वे पूरी तरह से अपने अफसरों की संवेदनशीलता पर निर्भर होते हैं।

इधर हमारे समाज की भी कुछ खासियतें हैं, भीषण बेरोजगारी के चलते हमारे सामने रोज़गार चुनने की स्वतंत्रता नहीं है, जो मिले उसी से काम चलाने की मजबूरी है। पुलिस वालों के साथ भी यही है। विभाग का लोअर स्टाफ या कांस्टेबुलरी इसलिए विभाग में नहीं है कि वो ऐसा चाहती है, बल्कि इसलिए है कि उसे यहीं नौकरी मिली, जिसे करना आजीविका के लिए उसकी मजबूरी है। पुलिस वालों का एक और नकारात्मक पहलू है, सामान्य जन की संवेदनशीलता इनके साथ कभी नहीं होती, इसलिए उसके साथ घुल मिल कर खुद को हल्का करने का सेफ्टी वॉल्व भी पुलिस वालों के लिए मयस्सर नहीं। अलावा इसके पुलिस विभाग का आन्तरिक प्रशासन भी और विभागों की तरह से भ्रष्ट, काहिल और नाकारा है। इससे निपटना लोअर स्टाफ के लिए ज्यादा मुश्किल होता है।

इतने अंतर्विरोधों से निपट कर ही नौकरी करना सामान्य पुलिस जन की मजबूरी है। ऐसे में दो तरह से पुलिस वाले नौकरी करते हैं एक तो विवेक तिवारी काण्ड के आरोपी कांस्टेबल प्रशांत की तरह से और ज्यादातर हरदोई वाले कांस्टेबल की तरीके से बच-बचा कर और संतुलन साध कर, तब भी अनहोनी हो ही जाती है एक आरोपी हो जाता है, दूसरा आत्महत्या कर लेता है। इसके बाद मची बमचख में यह देखने की फुर्सत किसे है कि ये दोनों कांस्टेबल इस हद तक नहीं पहुँचने पायें, इसे रोकने के लिए, जिन पर इनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी थी, ऐसे आला अफसरान ने क्या किया? ज़ाहिर सी बात है उन्होंने कुछ नहीं किया, तभी ये दो अतियां संभव हुईं।

इन दोनों घटनाओं को प्रतीक माने और पुलिस का इतिहास खंगाल कर देखें तो ऐसी ही और तमाम घटनाएँ मालूम चलेंगी। मतलब साफ़ है, सामान्य पुलिस वाला तो जो भी परिस्थति उसे मिली है, उसी में अपना काम जैसे – तैसे निपटा ले रहा है, लेकिन स्थितियां बेहतर हों, ऐसा कर पाने में उसके आला अफसरान लगातार असफल साबित हो रहे हैं। अपने देश – काल में परिवर्तन तेज़ी से हो रहे हैं, अब सामान्य कांस्टेबल भी जो भरती हो रहा है वो कहीं अधिक पढ़ा लिखा और तकनीकी तौर पर ज्यादा जागरूक और कुशल है। समाज में सम्पन्नता आई है, ऐसे में केवल डंडे के जोर से नियंत्रण संभव नहीं। अनहोनी के रूप में अक्सर आने वाला बुखार लगातार बता रहा है कि रोग बढ़ रहा है, लेकिन आला अफसरान रूपी डॉक्टर अंग्रजों के ज़माने के नुस्खों से ही काम चला रहे हैं, जबकि ज़रुरत है नए नुस्खों की, वर्ना महामारी फैलते देर नहीं लगेगी।

2 Comments
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