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हाल-फिलहाल तो विश्वगुरु नहीं बनेगा भारत

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मुग़ल बादशाह जहांगीर का दरबार सजा हुआ था और उसके सामने विनीत भाव से ब्रिटेन का दूत टॉमस रो खड़ा हुआ था, उसके पास सिर्फ दस मिनट का समय था, जिसमें उसे बादशाह को खुश कर भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापार का लाइसेंस प्राप्त करना था। टॉमस रो के लिए ये बड़े इम्तिहान की घड़ी थी, क्योंकि उसके पहले कई दूत असफल होकर वापस जा चले गए थे और ब्रिटेन की तत्कालीन महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम भारत-ब्रिटेन के बीच व्यापार शुरू हो सके, इसके लिए व्यग्र थीं।

बहरहाल टॉमस रो ने कुशल वक्ता होने का परिचय दिया और बादशाह की बेहतरीन खुशामद की, उसने कहा, बादशाह ने मुझे मिलने का समय देकर धन्य कर दिया, क्योंकि मैं हुज़ूर के जूतों की धूल से भी ज्यादा नाचीज़ हूँ, ज़ाहिर सी बात है, इस विनम्रता का फल मिलना था और मिला भी। ब्रिटेन को भारत के साथ व्यापार का लाइसेंस मिल गया। टॉमस रो ने हद से ज्यादा विनम्रता दिखा कर अपने देश के लिए अकूत सम्पदा की राह खोल दी। एलिज़ाबेथ प्रथम, टॉमस रो के काम के महत्व को समझ रही थीं, इसलिए उन्होंने टॉमस को ब्रिटेन के सबसे बड़े ख़िताब सर से नवाज़ा। महारानी ने सर टॉमस रो, से मुग़ल और ब्रिटेन के दरबार के अंतर को भी जानना चाहा तो उन्हें जवाब मिला कि मुग़ल दरबार की तुलना में आपका दरबार एक बड़े संपन्न देहाती की बैठक भर है।

सवाल यह है कि एक सामान्य व्यापारिक समझौते के लिए ब्रिटेन की महारानी क्यों व्यग्र थीं? इसे जानने के लिए यूरोप के पुनर्जागरण की कहानी जानना दिलचस्प होगा। 14-15 वीं शताब्दी में कई वजहों से यूरोप में औद्योगिक क्रांति हुई और वहां की कृषि आधारित इकॉनमी, उद्योग उन्मुख हो गयी। उस समय तक यूरोप की अर्थव्यवस्था भी, पूरी दुनिया की तरह कृषि आधारित थी। दुनिया की अर्थ व्यवस्था में यूरोप उस समय काफी पीछे था। उसी से उबरने के लिए वहां औद्योगिक क्रांति हुई साथ ही यह क्रांति गतिमान हो सके इसके लिए धार्मिक सुधार भी हुए। कई वजहों से यह क्रांति ब्रिटेन और फ्रांस में सबसे पहले हुई। यह क्रांति तेज़ी से बढ़े इसके लिए दो चीज़ें अनिवार्य थीं, एक तो काफी मात्रा में धन दूसरे यूरोप में मशीनों से जो सामान बने, उसे खपाने का बाज़ार।

यह काम हो सके इसलिए औद्योगिक क्रांति के प्रभु वर्ग ने धन के लिए एशिया महाद्वीप की तरफ रुख़ किया और बाज़ार के लिए अमेरिका और अफ्रीका की तरफ़। उस समय धनी देश एशिया में ही थे और उसमे भी भारत सिरमौर था। भारत के धनी होने का कारण बहुत साफ़ था, ज़रुरत का सब सामान यहीं बनता था और बाहर के देशों से आयात नहीं के बराबर था जबकि गरम मसालों समेत तमाम चीज़ों का निर्यात कर भारत करोड़ों रुपयों की स्वर्ण और रजत मुद्राएँ हर साल कमाता था। उस समय कागज़ की सांकेतिक मुद्राएँ नहीं चला करती थीं, तब की वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक और वजह से भारत का महत्व ज्यादा था। लगभग दो हज़ार साल से देश की अर्थ व्यवस्था और ज्ञान-विज्ञान लगातार बढ़ रहा था, शासक भले बदल जाते थे लेकिन वे पुरानी व्यवस्था से छेड़छाड़ नहीं करते थे। इसी लिए तब के व्यापारिक जगत में भारत को ऐसा कुण्ड बोलते थे, जिसमे दुनिया भर का सोना–चांदी गिरता है।

ज़ाहिर सी बात है ऐसे देश से व्यापार के लाइसेंस का महत्व ब्रिटेन का प्रभु वर्ग समझ रहा था, उसने महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम से सहायता मांगी, लेकिन तब बात दूसरी थी। प्रतापी मुगलों की निगाह में ब्रिटेन की हैसियत एक खुदरा व्यापारी से ज्यादा नहीं थी और तब के वैश्विक व्यापारिक जगत में वे सब छल-कपट प्रचलन में नहीं थे जिन्हें यूरोप के औद्योगिक देशों ने बाद में अपनाया। इसलिए मुग़ल दरबार में तब के छोटे व्यापारी ब्रिटेन के प्रतिनिधि की पहुँच नहीं थी, जिसे सर टॉमस रो ने सम्भव कर दिया। उसके बाद जो हुआ, जिसे अब सभी जानते हैं, उस लाइसेंस से शुरू हुई कपट की राजनीति से ब्रिटेन न केवल भारत का मालिक बना वरन विश्व में औद्योगिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का भी सिरमौर बना। कृषि आधारित वैश्विक सामंती अर्थव्यवस्था में, जिसका सिरमौर भारत था, और चाहे जो भी कमियां रही हों, कपट आचरण बिलकुल नहीं था, इसलिए यूरोप के देश क्या करने वाले हैं, इसका गुमान कालांतर में उपनिवेश बने अमेरिका, एशिया और अफ्रीकन देशों को नहीं था।

जो काम भारत और अपने दूसरे उपनिवेशों में ब्रिटेन ने किया, वही यूरोप के दूसरे देशों ने विश्व के और तमाम मुल्कों में किया। यूरोप की औद्योगिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था बनी रहे इसलिए उन्होंने उपनिवेशों की मूल अर्थव्यवस्था और संस्कृति को काफी हद नष्ट किया। नतीजे में अब दुनिया औद्योगिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की छतरी के नीचे थी, जिसमे कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की कोई कीमत नहीं थी। इधर विधि का विधान भी चालू था। अमेरिका भी ब्रिटेन का उपनिवेश था, जो उसके चंगुल से जल्दी ही मुक्त हो गया और यूरोप का ही व्यापारिक, आर्थिक मॉडल अपनाकर जल्दी ही उसे चुनौती देने लगा। दूसरे विश्व युद्ध में जब यूरोप के देश आपसी लड़ाई में पस्त हो गए तो अमेरिका का वर्चस्व पूरी दुनिया पर स्थापित हो गया।

इधर जो देश दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए, उनमे से अधिकाँश ने अर्थव्यवस्था का औद्योगिक पूंजीवादी मॉडल ही अपनाया क्योंकि उनकी मूल अर्थव्यवस्था तो कब की नष्ट की जा चुकी थी, ऐसे में ज़ाहिर सी बात है इस व्यवस्था के जनक यूरोप और अमरीका से बाकी देशों को पीछे रहना है, इसीलिए वे पीछे हैं भी। अब यहीं पर याद आते हैं अर्थशास्त्र के आदि गुरु कौटिल्य, जिन्होंने अर्थव्यवस्था को सारी उपलब्धियों का आधार बताया था, ऐसे में यही मानना उचित है कि औद्योगिक पूंजीवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था में तो सिरमौर अमेरिका और यूरोप ही हैं, जो दिखता भी है। अब जो कुछ नया होगा वो वर्तमान व्यवस्था को बदलने वाली व्यवस्था में ही होगा।