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हर किसी को हर बार मूर्ख बनाना असम्भव

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कहावत है कि किसी व्यक्ति को मूर्ख बनाना सम्भव है, कुछ लोगों को कई बार मूर्ख बनाना सम्भव है लेकिन हर किसी को हर बार मूर्ख बनाना असम्भव है। छोटी सी कहावत है सो छोटे लोगों को समझ में आ जाती है। लेकिन बड़े लोग अपने बड़प्पन के मद में शायद साधारण चीज़ें समझना ही नहीं चाहते और उसमें भी करेला दूजे नीम चढ़ा की तर्ज़ पर यहाँ के शासक दलों के नेता, शासन में रहते जिनका मानना होता है कि वे सर्वज्ञ हैं। यह और बात है कि गद्दी जाते ही उन्हें अपनी लघुता और अज्ञान का आभास तत्काल हो जाता है। सर्वज्ञता के इसी अतिरेक में कुछ सालों से प्रवासी भारतीयों के सालाना सम्मलेन का प्रहसन हर साल होने लगा है, कभी-कभी साल में एकाधिक बार भी।

ऐसा ही एक सम्मलेन अभी-अभी वाराणसी में होकर ख़त्म हुआ है। अब इसी जगह पर एक किस्सा प्रासंगिक है सुन लें, एक खगोल विज्ञानी हुए हैं डॉक्टर हरगोविन्द खुराना। अपने शुरुआती दिनों में उन्होंने भारत में ही रहकर रिसर्च करनी चाही लेकिन षड्यंत्रकारी और दोयम दर्जे की मेधा वाले उनके वरिष्ठों ने उन्हें काम नहीं करने दिया। निराश खुराना अमेरिका गए जहां उनकी मेधा का सम्मान हुआ और उनके शोध को नोबल प्राइज मिला। तत्काल आत्मगौरव से हीन भारतीयों ने हल्ला मचाया कि भारतीय को नोबल प्राइज मिला। खुराना साहब पढ़े लिखे आत्मगौरव वाले व्यक्ति थे, उन्होंने अमेरिका से बहुत ही मानीखेज जवाब भिजवाया कि भारतीय को नहीं भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक को नोबल प्राइज मिला।

इस किस्से में बहुत से सन्देश छिपे हैं। भारत से जो प्रतिभा पलायन हो रहा है उसकी दो वजहें हैं एक तो संसाधन हीनता दूसरे यहाँ के कार्यालयों और संस्थानों का घुटन भरा षड़यंत्र कारी माहौल। ऐसे सम्मेलनों में शिरकत कर पिकनिक मनाने आये प्रवासी भारतीय और बक बक करने वाले स्थानीय नेता और अफसर इस बात को जानते हैं कि प्रतिभा पलायन को ज़िम्मेदार माहौल अभी भी कतई नहीं बदला है लेकिन ऐसी बक बक को पिकनिक की अनिवार्यता मानकर वे भी मज़ा लेते हैं।

इसीलिये आप गौर करें इतने प्रवासी सम्मलेन हुए, कोई उपलब्धि मिली? और मिलेगी भी नहीं, कारण साफ़ है जिनके संघर्ष में आपने उनको कुछ नहीं दिया, यहाँ तक कि सहानुभूति भी नहीं, वे भी अपनी सम्पन्नता में से आपको कुछ क्यों दें?
इसी तरह के सम्मलेन आजकल और भी होने लगे हैं मसलन उद्यमियों के सम्मलेन कि आओ भैया हमारा उद्धार करो। अब जब नेता अफसर गुहार लगायेंगे और शानदार दावत का इन्तिज़ाम भी हो तो उद्यमी क्यों नहीं कृपा करने आयेंगे? बाकी प्रदेशों की बात तो मुझे नहीं मालूम लेकिन अपने सूबे में दो दशक से जब भी गुहार लगती हैं उद्यमी देश-विदेश से कृपा कर प्रकट हो जाते हैं।

बड़े-बड़े वादे होते हैं लेकिन उसके बाद क्या होता है यह किसी को नहीं मालूम और नहीं कोई मालूम करने की कोशिश करता है, सब जानते हैं प्रहसन था, ख़त्म हुआ। अब यहीं पर कहावत को फिर याद कर लीजिये कि हर किसी को हर बार मूर्ख बनाना सम्भव नहीं। इसलिए बुलाये जाने वाले प्रवासी और उद्यमी भी इस बात को जानते हैं। घाटे में सिर्फ आम आदमी होता है जिसके धन से ऐसी निरुद्देश्य पिकनिकें मनाई जाती हैं।