- Advertisement -

- Advertisement -

पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव आज तक सहला रहे हिन्दू-मुसलमान

0 1,885

किसी व्यक्ति परिवार या समाज में कुछ घटनाएं ऐसी हो जाती हैं कि वे सब कई पीढियों तक उस घटना से प्रभावित होते रहते हैं। ये प्रभाव अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। ऐसी ही एक घटना है सन 1761 में हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई। इस लड़ाई के बारे में जानने से पहले लड़ाई क्यों हुई, यह जानना दिलचस्प होगा। इतिहास की एक धारा के मुताबिक उत्तर भारत में अंतिम महान हिन्दू सम्राट हर्ष वर्धन और दक्षिण भारत में रायरायान कृष्णदेव राय थे। मुस्लिम आक्रांताओं के हमले भारत पर आठवीं-नवीं शताब्दी से ही शुरू हो गए थे। लेकिन 11वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ ही भारत में उनके साम्राज्य की शुरूआत हो गई।

मुस्लिम राजा जब आए तो निरूसन्देह उन्होंने हिन्दुओं पर अत्याचार किए। लेकिन ऐबक के दामाद और दूसरे सम्राट इल्तुतमिश के साथ ही मुस्लिम आक्रमणकारी राजाओं ने यहां की हिन्दू बाहुल प्रजा के साथ मेल मिलाप शुरू कर दिया और कोशिश की कि हिन्दुओं की भावनाएं आहत नही हों। यह प्रवृत्ति बढ़ती ही गई और 18वीं-19वीं शताब्दी तक हिन्दू-मुसलमान खिचड़ी के दानों की तरह आपस में मिल गए।

लेकिन इस प्रवृत्ति के अपवाद भी रहे और वर्चस्व की लड़ाई में कई बार धर्म को भी हथियार बनाया गया। साथ ही यह भी हुआ शासक मुस्लिम वर्ग के विरुद्ध एक स्वाभाविक नाराजगी यहां के पुराने प्रभुवर्ग हिन्दुओं में बनी रही। यही नाराजगी औरंगजेब के शासन के बाद बहुविध तरीके से सामने आई। मुगलों के जमाने तक भी देश की अर्थव्यवस्था का आधार मुख्यतरू खेती ही था। कई वजहों से, जिनको गिनाना यहां अप्रासंगिक है, शाहजहां के अंतिम दिनों में खेती के संकट के दिन शुरू हो गए। कोढ़ में खाज यह भी हुआ कि औरंगजेब ने अपनी साम्राज्य लिप्सा में इस संकट को न केवल उत्तर भारत वरन दक्षिण भारत में भी बढ़ा दिया।

परिणाम स्वरूप पहला विद्रोह खेतिहर जाट बिरादरी ने किया। जिसका नेतृत्व गोकुल जाट ने किया। विद्रोही भविष्य में भी सिर न उठा पाएं इसलिए औरंगजेब ने गोकुल जाट को बड़ी कठोर पीड़ादायी सार्वजनिक मौत दी। लेकिन जब जीवन का आधार ही नष्टड्ढ हो रहा हो तो मौत का खौफ नहीं रह जाता। परिणाम स्वरूप ज्यादातर खेतिहर जातियां देश भर में मुगल शासन के खिलाफ उठ खड़ी हुईं। जिनमें सबसे ज्यादा सफल रहे जाट और मराठे। इस बगावत के तार्किक परिणाम स्वरूप मराठा क्षत्रपति शिवाजी और राजा सूरजमल जाट शासकों के रूप में सामने आए। महाराजा रणजीत सिंह को भी एक हद तक इसी श्रेणी में रख सकते हैं।

इन सबमें भी सबसे पहले व सबसे अधिक सफलता मराठों को मिली। हालाकि इसके लिए उन्होंने बड़ी कीमत भी चुकाई। शिवाजी जिन्दगी भी औरंगजेब से लड़े। उनके पुत्र सम्भाजी को भी औरंगजेब ने मार डाला और पौत्र साहू को अपने यहां नजरबंद कर लिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र बहादुर शाह प्रथम ने साहू को सशर्त रिहा कर दिया और उन्होंने पूना पहुंचकर क्षिन्न भिन्न और विखंडित मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली। शिवाजी के बाद किसी केन्द्रित नेतृत्व के अभाव में मराठा साम्राज्य एक ढीला ढाला सा संगठन था। जिसमें सिंधिया, होलकर और गायकवाड़ समेत पांच बड़े घराने थे जो लगभग स्वतंत्र थे।

इन सब को एकत्रित कर अपने प्रधानमंत्री पेशवा, जो ब्राह्मण थे, की मदद से साहू ने मराठा साम्राज्य को मुगलों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश शुरू की। मुगलों के खिलाफ अपने संघर्ष को न्यायोचित, प्रभावी और व्यापक बनाने के लिए जब ब्राह्मड्ढण पेशवा बाजीराव ने हिन्दू स्वराज की बात की तो उसका जनमानस पर खासा असर पड़ा। बाजीराव बड़े योद्धा थे, उन्होंने मराठा साम्राज्य को लगभग आधे हिन्दुस्तान में प्रभावी बना दिया। लेकिन मराठा शासक एक काम नहीं कर पाए। जो जगहें उन्होंने जीती वहां पर प्रभावी शासनतंत्र स्थापित कर वे जनता के प्रिय नहीं बन सके। दूसरे उस समय मराठों से इतर जो दूसरी ताकतें सक्रिय थीं उनकी आपसी लड़ाई का फायदा उठाकर भारत सम्राट मुगल ही बने रहे।

इन्हीं सब परिस्थितियों में अपने अंतकाल में साहू जी ने घोषणा की कि उनके बाद मराठा साम्राज्य के अधिपति पेशवा ही होंगे। और मराठा क्षत्रप पेशवा के अधीन मराठा शासन को विस्तार देकर मुगलों को अपदस्थ करेंगे। इस तरह साहू राजा की मृत्यु के बाद खेतिहर जाति मराठों के साम्राज्य के अधिपति ब्राह्मड्ढण पेशवा हो गए। मुगल साम्राज्य भी उस समय लग रहा था कि अस्त होने वाला ही है, बस एक सांघातिक धक्के की जरूरत है। साथ ही उस समय की अराजकता से फायदा उठाकर साहसी और लूटमार करने वाले शासक और लुटेरे भी सिर उठाने लगे थे।

ऐसा ही एक शासक था अफगानिस्तान का अहमद शाह अब्दाली। वह लूटमार के इरादे से कई बार भारत आ चुका था। लेकिन ऐसा नहीं था कि वह महमूद गजनवी की तरह केवल लुटेरा ही था। वह एक कूटनीतिक शासक भी था। ऐसे में कई हिन्दू-मुस्लिम शासकों के साथ उसके मित्रता के संबंध थे। ऐसी स्थिति में 1761 में जब एक बार फिर अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया तो उसका सामना न ही भारत सम्राट मुगलों ने किया और न ही किसी और क्षत्रप ने। पेशवा के अधीन मराठों ने रणनीति बनाई कि अगर अब्दाली का सामना कर उसे हरा देते हैं तो फिर स्वाभाविक रूप से जो परिस्थितियां बनेंगी उनमें मुगलों को सांघातिक धक्का देने में पेशवा सफल रहेंगे। साथ ही हिन्दू स्वराज का उनका सपना भी पूरा हो जाएगा।

इस सोच के तहत पानीपत की तीसरी लड़ाई में अब्दाली और पेशवा की सेनाओं ने युद्ध का फैसला किया। मराठों ने निरूसन्देह बहुत अच्छी सेना सजाई और वह जीत के प्रति इतने अधिक अश्वस्त थे कि इस लड़ाई में पहली बार मराठा सरदारों की पत्नियां और परिवारीजन भी उनके साथ आए कि लड़ाई जीतने के बाद उत्तर भारत के तीर्थों की यात्रा करने के बाद तब पूना वापस जाएंगे। लेकिन मराठों के शत्रुओं ने भी इस लड़ाई में अवसर देखा। उन्होंने अब्दाली की सहायता की। उनमें से कई आमने-सामने मराठों से संघर्ष का सामर्थ्य नहीं रखते थे। इसलिए सोचा कि अब्दाली जीता तो अफगानिस्तान लौट जाएगा और मराठों को नष्ट कर देगा साथ ही वे स्थानीय राजा मराठों के प्रकट शत्रु भी नहीं बनेंगे। इसी पृष्ठड्ढभूमि में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई और अपराजेय मराठा सेना बुरी तरह हारी, इस हद तक कि लड़ाई में तत्कालीन पेशवा के भाई व बेटे भी मारे गए।

अब परिदृश्य बदल गया था। सांघातिक धक्का मुगलों के बजाय मराठों को लग चुका था। साथ ही प्लासी और बक्सर की लड़ाईयां जीतकर अब अंग्रेज भारत के अधिपति बनने की ओर अग्रसर थे। मुगलों का गौरव और पेशवा का हिन्दू स्वराज का सपना चकनाचूर हो चुका था। अब शासन अंग्रेजों को करना था और जाहिर है कि उनकी अपनी प्राथमिकताएं थी। गौर से देखें तो तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप के हिन्दू और मुसलमान दोनों आज तक पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव सहला रहे हैं। लेकिन काल की गति निराली है। कई बार मनुष्य की सोच काल की गति के सामने धराशायी हो जाती है। फिर भी दोनों अपनी फितरत से बाज नहीं आते।

Comments
Loading...