- Advertisement -

- Advertisement -

इल्तुतमिश ने रखा था, अकबर की महानता का आधार

0 690

हर व्यक्ति, संस्था, समाज और स्थान का अपना महत्व और इतिहास होता है। कई बार इतिहास इनके साथ न्याय नहीं भी करता। अक्सर यह अन्याय दरगुज़र हो जाता है, लेकिन कई बार यह अन्याय सोचने को मजबूर करता है‌। तेरहवीं शताब्दी में हुए गुलाम वंश के दूसरे बादशाह इल्तुतमिश के साथ इतिहास के अन्याय का अहसास तब और गहरा हो जाता है जब हम आज के दौर मे भी धर्मजनित समस्याओं का समाधान खोज पाने में खुद को नाकाम पाते हैं।

खास तौर से हिंदुस्तान के संदर्भ में इल्तुतमिश ने आज से करीब आठ सौ साल पहले ना केवल इस समस्या का समाधान खोजा बल्कि उसे सफलता से लागू भी किय। इतना ही नहीं लड़कियों को कोख में ही मार डालने के इस दौर में यह याद करना जरूरी है कि बादशाह ने उस समय अयोग्य पुत्रों पर योग्य पुत्री को तरजीह दी और रज़िया को अपने बाद सुल्तान बनाया।

कुतुबुद्दीन ऐबक हिंदुस्तान का पहला मुसलमान बादशाह था।  इस्लाम उस समय अपने शुरुआती आक्रामक दौर में था। दिल्ली मे मेहरौली के पास बने जैन मंदिरों को ऐबक ने तोड़ डाला और उस मलबे से वहीं कुव्वतुल इस्लाम यानी इस्लाम की कुव्वत, नाम की मस्जिद बनवाई जो आज भी देखी जा सकती है। बाद में कुतुब मीनार का निर्माण भी उसी मलबे से शुरू हुआ। ऐबक ने शासन पूरी तरह इस्लामिक कानूनों के तहत किय। ऐबक का शासन चार साल चला और उसके बाद दिल्ली की गद्दी पर उसका दामाद इल्तुतमिश बैठा ।

इल्तुतमिश युवावस्था में गुलाम था जो अपंनी काबिलियत की बदौलत ना केवल ऐबक का दामाद बना वरन उसके बाद गद्दी पर भी बैठा । इस पूरे दौर में उसने भारत में इस्लामिक शासन की दुविधाओं और कठिनाइयों को समझा और खुद जब बादशाह बना तो इनका बहुत ही तर्क संगत हल निकाला। इस्लाम के उस शुरुआती दौर में नियम ये था कि किसी भी देश का मुसलमान राजा, उस देश में, मुसलमानो के खलीफा का प्रतिनिधि समझा जाता था और उसे शासन इस्लामिक कानूनों के तहत ही चलाना होता था।

लेकिन इल्तुतमिश ने कहा कि हिंदुस्तान का शासन इस्लामिक कानूनो से चलाना उचित नहीं है क्योंकि इस देश के लोग मुसलमान नहीं हैं, हाँ बादशाह ज़रूर मुसलमान है, इसलिये इस देश का शासन परम्परागत कानूनों से ही चलाना मुनासिब होगा। दूसरी बात जो बादशाह ने कही वो यह कि खलीफा मेरे धर्मगुरु हैं ना कि इस देश के, इसलिये भारत के धर्म और शासन से खलीफा का कोई लेना – देना नहीं । हाँ खलीफा मेरे लिये ज़रूर आदर के पात्र हैं।

इल्तुतमिश ने तेरहवीं शताब्दी में ही यह तय कर हिंदुस्तान को कई मुसीबतों से बचाया । सबसे बड़ी बात सत्ता और धर्म की भूमिका की बाबत उसने साफ परिभाषित कर दिय। दूसरी बड़ी मुसीबत ये आई कि जिस समय इल्तुतमिश गद्दी पर था, उसी समय चंगेज़ खान की पुत्री से ख्वारिज्म शाह के पुत्र मुग्बरनी का प्रेम प्रसंग चला, जो भाग कर पंजाब चला आया | उसने मुसलमान होने का वास्ता देकर इल्तुतमिश से मदद माँगी, लेकिन इल्तुतमिश ने इस तर्क को नहीं माना और उस की कोई मदद नहीं की।

इल्तुतमिश ने तर्क दिया कि मुसलमान होने के नाते अगर शाह की मदद की गई तो चंगेज़ खान हिंदुस्तान पर हमला कर देगा जो इस देश के हित में नहीं होगा, धर्म अपनी जगह है और राजनीति अपनी जगह। बादशाह के इस फैसले ने हिंदुस्तान को बहुत बड़ी मुसीबत से बचा लिया। अपने समय की सोच से बहुत आगे की सोच वाले इल्तुतमिश ने जब देखा कि उसके लड़के अयोग्य हैं तो उसने शासन की बागडोर अपनी लड़की रज़िया को दी,जिसने बतौर सुल्तान अपने पिता के फैसले को सही साबित किया, हालांकि पुरुष प्रधान उस समय के समाज मे रज़िया का शासन लम्बा नही चला और उसकी हत्या कर दी गई।

अगर सोचा जाये तो अकबर ने जो किया, उसका आधार इल्तुतमिश बहुत पहले हिंदुस्तान में रख चुका था, लेकिन इतिहास ने वो महानता अकबर के खाते में डाली। बहरहाल इतिहास का अन्याय अपनी जगह,लेकिन हिंदुस्तान को इल्तुतमिश की देन अकबर से कमतर नही, साथ ही यह भी कि मुसलमानो को तमाम फसादों की जड़ मानने वाले वर्ग को यह याद रखना चाहिये कि वे आज भी अपनी लड़कियों को कोख मे ही नहीं मार डालते, दुनिया देखने देते हैं।

Comments
Loading...