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इन्हीं कन्धों पर है भारत को विश्वगुरु बनाने का बोझ

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देश जब आज़ाद हुआ तो उम्मीद और संभावनाओं से भरा हुआ था। उसी अतिरेकी दौर में ऐसा कहने वाले लोग भी थे कि अपना देश जल्दी ही फिर से विश्वगुरु बनेगा। हालांकि ऐसे लोग कम थे लेकिन थे, क्योंकि ज्यादातर को उन दिक्कतों का आभास था जिनसे देश तब रूबरू था और ऐसे में विश्वगुरु बनने का सपना देखना हास्यास्पद ज्यादा था। बहरहाल इन्हीं उम्मीदों और आशंकाओं के बीच जब पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने तब के उद्योगपतिओं और धनी लोगों से देश के निर्माण में सहायता मांगी तो ज्यादातर ने हाथ खड़े कर दिए।

आखिर में मजबूर होकर प्रधानमंत्री को महलानोबिस प्लान लागू करना पड़ा, इस प्लान के मुताबिक, भारत में बड़े उद्योग लगाए जाएं, इसके लिए आधार सरकार को बनाना था। पैसा इसके लिए विश्व बैंक से लेना था। तय यह हुआ था कि सरकार से मिले संसाधनों की मदद से उद्योगपति उद्योग लगायेंगे। उत्पादन का कुछ हिस्सा देश में खपाया जायेगा और कुछ का निर्यात होगा ताकि उस से मिली विदेशी मुद्रा से सरकार को विश्व बैंक का कर्जा चुकाने में मदद मिले। इस सोच के पीछे एक वजह और भी थी। तब सोचा ये भी गया की देश के उद्योगपति बहुत जल्दी अपनी काबिलियत से देश की इकॉनमी को तो मज़बूत करेंगे ही, साथ ही खेती के अतिरिक्त हाथों को भी रोज़गार देंगे। इसके अलावा उद्योगों से जो नया सेवा क्षेत्र उत्पन्न होगा वो भी नए रोजगार पैदा करेगा।

देश के उद्यमियों की चमत्कारी क्षमता को पहचान कर ही ये प्लान बना होगा | उन्होंने कैसा चमत्कार दिखाया इसके लिए एक ही किस्सा काफी है। तब के दो बड़े उद्यमियों ने यूरोप की कम्पनियों से तकनीकी उधार लेकर एम्बेसडर और फ़िएट कार बनाई और देश में ही खपा दी। एक भी कार दूसरे देशों में नहीं बिकी, ज़ाहिर सी बात है किसी किस्म की कोई विदेशी मुद्रा अपने देश को नहीं मिली, वह तो भला हो विदेशी सहायता और हस्त शिल्प के निर्यात से मिली विदेशी मुद्रा का, जिससे अपने देश की अर्थ व्यवस्था का काम चलता रहा, रुका नहीं। लेकिन एक काम फिर भी हुआ विश्व बैंक से लिया कर्जा चुकाने का बोझ तो तब की सरकारों को उठाना ही पड़ा , जो जनकल्याण के कामों पर भारी पड़ा।

देश के उद्यमियों की असलियत जब तक सामने आई नुकसान हो चुका था। लेकिन उस नुकसान पर, सरकारी उद्यमों में पैदा हुए रोजगारों, हस्त शिल्प के निर्यात से मिली विदेशी मुद्रा और विदेशी सहायता के तौर पर मिले धन से काबू पाया जाता रहा। लेकिन खेती में हुए नुकसान पर तब की सरकारें काबू नहीं पा सकीं क्योंकि उद्योगों को चमकाने के चक्कर में खेती की भी उपेक्षा हुई नतीजे में देश को 1965, 66 और 67 में भीषण अकाल का सामना करना पड़ा। वह तो भला हो अमेरिका से दान में मिले लाल गेहूं का, वर्ना करोड़ों की संख्या में लोग भूखे मर जाते।

तब तक प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री बन चुके थे, वो उद्यमियों की काबिलियत परख चुके थे, इसलिए उनका फोकस किसानों और जवानों पर रहा। उन्होंने हरित क्रांति के रूप में देश में खेती की उन्नति पर जोर दिया और परमाणु हथियार बनाने की दिशा में सक्रियता बढ़ाई। इसी वजह से ऐसा कहा जाता है की 1965 की लड़ाई के बाद ताशकंद में हुए समझौते के दौरान सी.आई.ए. ने शास्त्री जी की हत्या करवा दी, क्योंकि शीत युद्ध के उन दिनों में अमेरिका, परमाणु ताक़त की हैसियत भारत की हो, ऐसा नहीं चाहता था।

बतौर केंद्रीय मंत्री इंदिरा गाँधी इन सब गतिविधियों से वाकिफ थीं, इसलिए प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इन सारी नीतियों को लागू रखा, फलस्वरूप देश अन्न उत्पादन में आत्म निर्भर हुआ, यहाँ दुग्ध क्रांति हुई और 1974 में ही परमाणु विस्फोट कर इंदिरा गाँधी ने देश को परमाणु शक्ति बना दिया। ज़ाहिर है 1974 के बाद से किसी देश की हिम्मत भारत से टकराने की नहीं हुई। ये सब तो हुआ लेकिन शुरुआती ग़लती का खामियाजा तो भुगतना ही था। 1980 तक आते आते भारत विश्व बैंक के क़र्ज़ जाल में फँस गया। मामला इस कदर खराब हुआ की 1991 में चन्द्र शेखर की सरकार के दौरान देश को अपना सोना विश्व बैंक में गिरवी रख कर क़र्ज़ लेना पड़ा।

चन्द्र शेखर के बाद आई नर सिंह राव की सरकार ने मामले की नजाकत को समझा और देश की अर्थ व्यवस्था को वैश्विक व्यवस्था के अधीन कर दिया, अब भारत घोषित तौर तकनीकी रूप से उन्नत पूंजीवादी यूरोप और अमेरिका का सहायक मात्र था, वही भूमिका देश की अब भी है। प्रधान मंत्री चाहे मनमोहन हों, अटल हों या फिर मोदी, सबको चलना विश्व बैंक की शर्तों के मुताबिक ही है, फर्क बस इतना है की कौन कितना झुक कर सलाम करता है, हाँ, देश के भीतर वे अपनी तरह से गाल बजाने के लिया स्वतंत्र हैं।

इन सबके फलस्वरुप देश का परिदृश्य ये है की देश के उद्यमियों ने अपनी दोयम दर्जे की हैसियत स्वीकार कर ली है और वे इसी लायक हैं भी। उद्यमिता के ज़ोरदार हल्ले के बावजूद विश्व बाज़ार में भारत के बनाये किसी ब्रांड की कोई पूछ नहीं है। पिछले दिनों जब ओबामा बतौर अमेरिकन प्रेसिडेंट भारत आये तो ये उद्यमी बाकायदा कतार बना कर दंडवत करने उनके कमरे के बाहर खड़े हो गए। दूसरी तरफ वो किसान जिसने देश को अनाज के मामले में आत्म निर्भर बनाया, उसको मरने के लिए छोड़ दिया गया है, नतीजे में रुपया दिन-ब-दिन डॉलर के मुकाबले गिर रहा है, और भी तमाम कमियां हैं, जिनका ज़िक्र यहाँ बेकार है क्योकि बावजूद इसके हमारे हुक्मरान देश को विश्व गुरु बनता देख रहे हैं। अब वे किसको बेवक़ूफ़ बना रहे हैं, वही बेहतर बता सकते हैं।

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