The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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जान है तो जहान है, ऐसी भी क्या जल्दी

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ख़बरें टुकड़ों में आती हैं, इसलिए अक्सर इस ओर ध्यान नहीं जाता कि वे कई बार नई बन रही प्रवृत्तियों की ओर भी इशारा कर रही होती हैं। अभी हाल ही में एक खबर आई कि दिल्ली में तैनात सीबीएसई के संयुक्त निदेशक के तीनों बच्चे सफारी से हरदोई के अपने गाँव जा रहे थे, तभी यमुना एक्सप्रेस वे पर हाथरस के पास हुए दुर्घटना में तीनों बच्चे और सफारी चला रहा ड्राईवर चारों मारे गए। घटना पीड़ादायक है और जिस पर गुज़री वही उसको समझ सकता है, इस पर भी बहस चली होगी कि ग़लती किसकी थी लेकिन दुर्घटना तो हो गयी। जब से तमाम राजमार्ग बन गए हैं और थोड़े से भी सम्पन्न परिवार के पास चार पहिया वाहन हो गए हैं, यह प्रवृत्ति सी बनती जा रही है कि लोग थोड़ी सी सुविधा के लिए सपरिवार अपने वाहन से सड़क मार्ग से यात्रायें करने लगे हैं।

जिस अनुपात में यह प्रवृत्ति बढ़ रही है उसी अनुपात में ऐसी ख़बरों में भी बढ़ोतरी हो रही है कि फलां जगह सड़क दुर्घटना में पूरा परिवार या किसी परिवार के अधिकाँश सदस्य मारे गए। बावजूद इसके यह प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। प्रथम दृष्ट्या देखा जाए तो यह कोई ग़लत बात नहीं है, लोगों की सोच होती है कि अपनी गाड़ी है, अपने हिसाब से चलाएंगे और जहाँ भी जायेंगे वहाँ स्थानीय यातायात में भी सुविधा होगी। बात सही है लेकिन इस थोड़ी सी सुविधा के लिए लोग उन सायास और अनायास होने वाले हादसों की ओर से आँखें बंद कर लेते हैं, जो रास्ते में हो सकते हैं और अगर भीषण हुए तो पूरा परिवार या वाहन में बैठे सभी लोग प्राण गवां बैठते हैं।

वैसे भी अपने यहाँ पुराना चलन है और पुराने लोगों को याद भी होगा कि बुज़ुर्ग लोग पूरे परिवार को एक साथ यात्रा नहीं करने देते थे या परिवार के सभी लड़कों के एक साथ कहीं भी जाने पर रोक थी। इस सोच के पीछे और कुछ नहीं केवल यह सावधानी थी कि दुर्घटना अगर हो भी तो नुकसान कम से कम हो। कई हो चुके सड़क हादसों के बाद ये फैक्ट सामने आये हैं कि ड्राइविंग रैश थी या मामला ओवरटेक का था या दो गाड़ियों की टक्कर हुए या गाड़ी कहीं टकरा गयी। ये सब कारण तो हैं ही लॉन्ग रूट में कई बार ड्राईवर को नींद आने की वजह से भी हादसा हो जाने की बात सामने आई है। और मेरी समझ से एक बात और भी है कि इन पारिवारिक यात्राओं में ड्राईवर अक्सर घर के युवा लड़के होते हैं जो लॉन्ग रूट की यात्राओं के अभ्यस्त नहीं होते।

जबकि दूसरी तरफ बसों, ट्रेनों या टैक्सी के ड्राईवर को बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है और वे पेशेवर होते हैं, इसीलिये इन गाड़ियों से होने वाले हादसे, घरेलू गाड़ियों की तुलना में काफी कम हैं। इन तर्कों का जवाब यह कह कर दिया जा सकता है और अक्सर दिया भी जाता है कि होनी को कौन रोक सकता है? तो फिर इस हठधर्मिता के आगे तो फिर कोई तर्क ठहरता ही नहीं और फिर किसी भी मामले में किसी भी सावधानी या नियमन का कोई मतलब नहीं। यह सब लिखने का कतई ये मतलब नहीं कि सड़क मार्ग से घरेलू गाड़ियों से लॉन्ग रूट की यात्रा ना करें या सपरिवार कहीं ना जाएँ। ये सब करें लेकिन जब बहुत ज़रूरी हो और वो भी पूरे एहतियात के साथ। मसलन लॉन्ग रूट की सड़क यात्रा करनी ही पड़े तो पैसों का मोह न करें पेशेवर ड्राईवर बुला लें।

यह तर्क भी अब कोई मतलब नहीं रखता कि अपनी गाड़ी से जहां जा रहे हैं, वहां स्थानीय यातायात में सुविधा होगी। हर जगह आजकल तमाम तरह के वाहन उपलब्ध हैं, थोड़े महंगे ज़रूर पड़ते हैं लेकिन जान से ज्यादा नहीं। लॉन्ग रूट की यात्राओं के लिए ट्रेनें और बसें हैं, उन्हीं का इस्तेमाल करें खासतौर पर इसलिए भी कि अपने यहाँ किसी भी किस्म के नियमन को मानने और इज्ज़त देने की परम्परा नहीं है। यह हमेशा याद रखें प्राण और परिवार सबसे ज्यादा ज़रूरी है, उससे ऊपर कुछ नहीं।

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