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याद है किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज का बदला नाम?

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स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी बड़े नेता थे, और देश के प्रधानमंत्री भी रहे, प्रधानमंत्री रहने के दौरान वे लखनऊ से सांसद रहे और शहर के लिए उन्होंने बहुत किया भी। इस नाते फ़र्ज़ बनता है कि लखनऊ में ऐसा कुछ किया जाए कि अटलजी की याद बनी रहे, यह सही बात है, लेकिन यह सही नहीं है कि अटलजी की याद बनाए रखने के लिए किसी और की याद मिटा दी जाए। ख़ास तौर से तब जब ऐसा करने वालों के पास अटलजी की याद बनाए रखने के लिए साधन और अवसर दोनों पर्याप्त हैं।
शुरुआत यहाँ से हुई कि अटलजी की मौत के बाद लखनऊ नगर निगम ने प्रस्ताव पारित किया कि हज़रतगंज का नया नामकरण अब अटलजी के नाम पर किया जायेगा। लगे हाथ यह भी जान लें कि हज़रतगंज नाम के पीछे की दास्तान क्या है? अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह के बाप और नवेँ नवाब थे अमजद अली शाह, वे सूफ़ी तबीयत के थे, इसलिए लोग उन्हें हज़रत भी कहते थे। इन्हीं अमजद अली शाह ने जब नए बाज़ार का निर्माण कराया, तो बाज़ार को उन्हीं की याद में हज़रतगंज नाम दिया गया, अंग्रजों ने इस बाज़ार को और ज्यादा सजा कर इसे लखनऊ की पहचान बना दिया। अमजद अली शाह की वफ़ात के बाद नवाब बने उनके बेटे वाजिद अली शाह ने हज़रतगंज में ही पिता की याद में सिब्तैनाबाद इमामबाड़ा बनवाकर उन्हें वहीं आख़िरी ठिकाना दिया। ये पूरी कहानी इसलिए ताकि हज़रतगंज नाम के पीछे के तर्क को समझने में आसानी हो। ऐसे ही अपने देश में तमाम जगहों के नाम हैं, उन नामों को रखने के पीछे वाजिब वजहें हैं और उन जगहों के धीरे–धीरे विकसित होने की दास्तान है, देखा जाए तो कई नाम अपने आप में इतिहास हैं, जो कई बार दिलचस्प भी होते हैं।
अब ज़ाहिर सी बात कि इतिहास के साथ मौका – महाल देख कर छेड़छाड़ करना इंसानी फ़ितरत है। इसीलिए जब भारत आज़ाद हुआ तो अंग्रेजों के नाम कई जगह से हटाए गए। यहीं लखनऊ में रानी विक्टोरिया की कई मूर्तियाँ हटाई गईं और भी कई नाम बदले गए। नागरिक प्रशासन ने तो यह काम कर डाला लेकिन सैन्य प्रशासन ने ऐसा नहीं किया, यहीं कैन्ट एरिया में आपको रानी विक्टोरिया, हडसन और आउट्रम सब मिल जायेंगे, जिनको अवध के इतिहास में खलनायक माना जाता है। शायद सेना की सोच हो कि नाम बदलने से इतिहास नहीं बदलता, वो तो जैसा है, वैसा ही किताबों में दर्ज रहेगा।
इसी फ़ितरत के तहत जब से प्रतीकों की राजनीति का दौर शुरू हुआ तो एक बार फिर इतिहास से छेड़छाड़ शुरू हुई। कमोबेश सभी दलों के नेताओं ने यह काम देश भर में किया लेकिन उत्तर प्रदेश में मायावती इस फ़ितरत में सबसे आगे रहीं, उन्होंने बसपा को फौरी तौर पर लाभ देने के लिए बहुत सी जगहों और संस्थाओं के नाम बदल डाले, जबकि उस समय वे बहुत कुछ नया बनाने में समर्थ थीं, जहाँ उन्हें ज़रूरी लगा वहां बनाया भी। मसलन आम्बेडकर के नाम पर जो भी बना, ज्यादातर नया ही बना, क्योंकि यह नाम उस समय मायावती को शक्ति और वैभव दिला रहा था। यही मानसिकता रही होगी, जिसके तहत मायावती को ताक़त दिलाने वाले सतीश मिश्र की माताजी के नाम से नया विश्वविद्यालय बना। अगर सिर्फ प्रतीक की राजनीति करनी होती तो किसी पुरानी यूनिवर्सिटी का नाम शकुंतला मिश्र के नाम पर रख दिया जाता।
छत्रपति शाहूजी का महत्व भी बसपा की राजनीति में केवल प्रतीकात्मक है क्योंकि आम्बेडकर की पढ़ाई में उन्होंने आर्थिक सहयोग दिया था, इसलिए किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज का नाम बदल कर उनके नाम पर रख दिया गया। उस समय मकसद पूरा हुआ और पुराना नाम जब वापस लौटा तो किसी को कोई फर्क भी नहीं पड़ा। आखिर में एक बात और कुछ नामों के पीछे परम्परा इतनी मज़बूत होती है कि उन्हें हटाना सम्भव नहीं होता, किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज ऐसा ही नाम है, जिसके पीछे जॉर्जियंस की लम्बी परम्परा है। अटलजी भी जनसंघ से भाजपा तक की परम्परा के शिखर पुरुष हैं, उनके नाम पर कुछ नया बनायें, प्रतीकात्मक नहीं, जबकि सामर्थ्य और संसाधन दोनों भरपूर हैं।

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