The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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वापस घर पहुँचने को ईश्वर की कृपा माने

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कहावतें हमेशा गागर में सागर भरने वाली होती हैं, ऐसी ही एक कहावत है, जब कुएँ में भांग पड़ी हो तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता। यह कहावत अपने शहर की यातायात व्यवस्था पर सटीक बैठती है। इसको बिगाड़ने के जितने भी सम्भव तरीके हैं, वो सब हमने आजमा डाले हैं। नतीजे में रोजाना सुबह के अख़बारों में सड़क दुर्घटना से होने वाली मौतों की ख़बरें प्रमुखता से छपती हैं और जो हाल है उससे ये पक्की बात है कि सिलसिला लम्बा चलेगा। सुबह घर से निकल कर अगर रात में घर वापस आ जाते हैं तो इसे ईश्वर की कृपा मानें, वर्ना घर से निकलते ही हम – आप मौत को दावत दे चुके होते हैं।

हाँ, एक बात और यहाँ हम लखनऊ के बहाने पूरे सूबे की यातायात व्यवस्था की बदहाली की बात कर रहे हैं। क्या क़स्बा और क्या शहर सभी जगहों पर पीक आवर्स में अब पैदल चलना भी दूभर हो गया है। अपने यहाँ तो यही हाल है, बाकी की राम जाने। कोई भी व्यवस्था एकदम से नहीं खराब होती, लम्बे समय की अनदेखी और खराब नियोजन से ये होता है। समस्या की शुरुआत करीब दो दशक पहले हुई, जब बैंक से कारों, मोटर साइकिल और स्कूटर की अंधाधुंध फाइनेंसिंग शुरू हुई, तब अपने समाज में ये गाड़ियाँ हैसियत की प्रतीक हुआ करती थीं, कारें ख़ास तौर से।

इसलिए ये सुविधा मिलते ही बड़ी संख्या में ऐसे लोगों ने भी गाड़ियाँ खरीद डालीं, जिन्हें ज़रुरत नहीं थी, ऐसे में सड़क पर भार बढ़ना लाज़िमी था और वो बेतहाशा बढ़ा भी। इससे निपटने के लिए जो नए इलाके बसे वहाँ तो सड़कें चौड़ी बना दी गईं, लेकिन पुराने इलाकों में ये सम्भव नहीं था, जबकि यातायात का दबाव वहीं ज्यादा है। मसलन चारबाग़ से इंदिरानगर, हज़रतगंज होते हुए जायेंगे तो वही पुरानी सड़क मिलेगी जो 25-30 साल पहले बनी होगी। अब सड़क वही और गाड़ियाँ कई गुना ज्यादा, समस्या तो होगी ही। इसे कम किया जा सकता है अगर पुरानी गाड़ियाँ समय से रफा-दफा हों और वाहनों के लिए लाइसेंस नियमानुसार दिए जाएँ, जो अनुभव बताता है कि सम्भव नहीं है। आरटीओ ऑफिस के लोगों को भी कमाना – खाना और ऊपर भी पहुंचाना है।

गलत नियमन, भ्रष्ट अफसरों और नेताओं ने भी अव्यवस्था फैलाने में अपना पूरा योगदान किया है, घूस देकर आप कहीं भी, कुछ भी बनाने को स्वतंत्र हैं, इससे अगर सड़क घिरती है तो घिरा करे, गाड़ियाँ सड़कों पर ही खड़ी होती हों तो हुआ करें, अफसरों-नेताओं की बला से। जहाँ भी सम्भव है हम – आप भी यातायात बिगाड़ने में अपना पूरा योगदान देते हैं। नाबलिग़ लड़के-लड़कियों को गाड़ियाँ देना और नियमानुसार नहीं चलना ये हमारे भी दो प्रमुख योगदान तो हैं ही। अब जब सभी अपना काम नहीं कर रहे हैं तो पुलिस वाले क्यों करें, वह भी तब जब यातायात पुलिस संख्या में भी कम है? जहाँ–जहाँ वे यातायात संचालित कर रहे हैं, उनका बड़प्पन माने वर्ना नियम तोड़ते हुए निकल जाएँ।

और भी तमाम कारण हैं जो सुगम यातायात व्यवस्था में बाधक हैं, जिन्हें हम आप जानते भी हैं, इसलिए उन सबको गिनाने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन एक बात बिलकुल साफ़ है कि खराब यातायात के लिए हम सब कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं, इसीलिए अब सबकी गाड़ियाँ कभी न कभी जाम में फंस रही हैं चाहे नेता हों या अफसर, बस उतने दिनों को छोड़ कर जब तक वे गद्दी पर हैं। साथ ही क्या बड़ा क्या छोटा सभी घरों के लोग सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं। ज़ाहिर सी बात है जब अराजकता है तो उसके शिकार सभी होंगे, फर्क बस इतना होगा कि किसका नम्बर कब आता है।

ऐसा नहीं है कि यातायात समस्या से निपटना सम्भव नहीं, बहुत आसान है, इसके लिए सार्वजनिक वाहन बढ़ा कर समस्या से निपटा जा सकता है, जो बड़े स्कूल – कॉलेज सड़क किनारे हैं, उन्हें वहां से हटाया जा सकता है और भी उपाय हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल इन्हें करे कौन, जिन्हें करना है उनके पास न तो कोई मुकम्मल योजना है और न ही ऐसा करने का संकल्प और साहस।

1 Comment
  1. Jonbir Das says

    Awesome

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