- Advertisement -

- Advertisement -

लोहियाजी के सिद्धांतों की सद्गति

0 179

कुदरत का निजाम भी अजीब है, कोई चीज़ कितनी भी सुन्दर क्यों न हो कालान्तर में कुरूप हो जाती है। कुछ इसी तरह से ये भी है कि सिद्धान्त ज़्यादातर लोगों के कल्याण के लिए बेहतरीन बनाए जाते हैं लेकिन लागू होने के क्रम में वे बद से बदतरीन होते जाते हैं। उसका कारण शायद ये होता हो कि सिद्धान्त किसी भी व्यक्ति या व्यक्ति समूह का उच्चतर व्यक्तित्व गढ़ता है लेकिन लागू होने के क्रम में हीन से हीनतर व्यक्तित्व भी उसमें शामिल हो जाते हैं जो देर सबेर उस सिद्धांत का तिया-पांचा कर ही डालते हैं।
स्वतंत्रता के बाद नया भारतीय समाज बनाने में कई शक्तियां, व्यक्तित्व और विचारधाराएँ सक्रिय थे, वे आमजन के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि भी थे। ऐसा नहीं कि वे सब देवता थे, मानवजन्य कमियां उनमें थीं लेकिन कुल मिलाकर वे उच्चतर व्यक्तित्व के स्वामी थे। लोहियाजी भी उनमे से एक थे।
डॉक्टर राम मनोहर लोहिया समाजवादी विचारधारा को मानने वाले थे और प्रगति की दौड़ में जो पीछे रह गए थे, उनकी नुमाइंदगी ज्यादा तेज़ी से करते थे। भारतीय समाज में यद्यपि जाति, वर्ग और धर्म का बड़ा ही पेचीदा ताना–बाना है बावजूद इसके लोहियाजी ने मोटे तौर पर पिछड़ी जातियों को विकास के लिए इकाई माना।
आज जिनको पिछड़ी जातियां माना जाता है, वे खेतिहर जातियां हैं जो खेती के उन्नत दौर में सम्पन्न थीं, ब्रिटिश राज और कालान्तर में जब खेती की अवनति का दौर शुरू हुआ तो वे भी समाज की प्रगति के दौर में पीछे रह गईं। खेती भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था और है भी इसलिये खेतिहर जातियां भी बहुत हैं। इसलिए इन्हीं को आधार बना कर लोहियाजी ने पिछड़ा पावे सौ में साठ का नारा दिया। यह नारा सबसे पहले प्रभावी 1967 में हुआ जब चुनाव के बाद नौ राज्यों में खेतिहर जातियों के दबदबे वाली सरकारें बनीं।
बस इसी समय से पिछड़ी ताकतें, समन्वयवादी कांग्रेस और दक्षिणपंथी भाजपा तब के जनसंघ के निशाने पर आ गईं। 1989 में इन तीनों ताकतों में फिर संघर्ष हुआ, जिसमें पिछड़ी ताकतें जीतीं। लेकिन यहीं से गड़बड़ी भी शुरू हुई, राजनीति अब लम्बे समय के लिए प्रतीकात्मक हो गयी। जाति और धर्म ही चुनाव जीतने के मुख्य प्रतीक बन गए। चुनाव जीतने के लिए जो इतर गुण थे वे गौड़ हो गए, मसलन अब नेताओं के परंपरागत चुनाव क्षेत्र नहीं रह गए और जीतने के लिए जनाधार होना ज़रूरी नहीं रह गया। राजनीति अब गुणा-भाग और प्रतीकों के भरोसे की जाने लगी। ज़ाहिर सी बात है अब ज़माना सेंगर सरीखे नेताओं का आ गया। वे प्रतीकों के सहारे जीतने लगे और कोई प्रतिबद्धता न होने से हर तरह के धत्कर्मों में लिप्त हो गए।
ज़मीन पर उतरने के बाद लोहियाजी के सिद्धांत में पिछड़े कुछ जातियों का प्रतीक मात्र रह गए, इसी तरह दक्षिणपंथ का प्रतीक राममंदिर हो गया और जब कुछ समझ में न आये तो उसके प्रतीक कांग्रेस और कम्युनिस्ट हो गए। नौबत ये है कि इन ताकतों के शीर्ष नेतृत्व को भी शायद ही अपने मूल सिद्धांतों के बारे में मालूम हो। अब सत्तासंधान ही इन सारी शक्तियों का मूल है। इसीलिए सेंगर कांग्रेस से सपा, बसपा होता हुआ भाजपा में शामिल हुआ। इस प्रतीक को समझें, तस्वीर अपने-आप साफ़ हो जाएगी।

Comments
Loading...