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लखनऊ की मलिका किश्वर की नज़ीर – पार्ट 1

जीत जाती तो बदल जाता वाजिद अली शाह का मुस्तकबिल

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उपनिवेश बाद का दौर था और यूरोप के तमाम देशों के अपने अपने उपनिवेश थे, जहां आजादी के लिए हिंसक संघर्ष हो रहे थे। ऐसे में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे बैरिस्टर मोहन दास करम चंद गांधी ने वहां पर आजादी का अहिंसक आंदोलन शुरू किया।

वह दर असल प्रयोग था जो काफी सफल रहा। उस शुरुआती सफलता के साथ महात्मा गांधी भारत लौटे और भारत के आजादी के आंदोलन मे शामिल हुए।

कालांतर में एक पत्रकार ने उनसे पूछा आपने आजादी के लिए अहिंसक आंदोलन का रास्ता क्यों चुना? जबकि ज्यादातर उपनिवेशों में आजादी के लिए हिंसक आंदोलन चलाए जा रहे हैं। गांधी जी ने जवाब दिया क्योंकि अंग्रेज़ कानून के शासन मे भरोसा करते हैं इसलिए यहां हिंसक आंदोलन की ज़रूरत नहीं।

गांधी जी के इस विश्वास पर तर्क वितर्क हो सकता है, लेकिन भारत पर अंग्रेज़ी शासन के दौर में कई प्रसंग ऐसे हैं जब अंग्रेजों ने कानून का आदर कर विपक्ष की बात सुनी और मामल सुलझाया भी, जबकि शासक होने के नाते वे अनसुनी कर सकते थे।

ऐसा ही एक प्रसंग अवध की मलिका किश्वर का भी है, जहां खुद महारानी विक्टोरिया ने प्रोटोकॉल से परे जाकर मलिका किश्वर का स्वागत किया और उन्हें न्याय का भरोसा दिया।

अवध और उसके नवाबों की कहानी दिलचस्प है। मुगलों ने हिंदुस्तान को 21 सूबों में बांट रखा था। इन सूबों पर सूबेदार शासन करते थे, जिनकी नियुक्ति बादशाह द्वारा की जाती थी और समय समय पर इनका तबादला एक सूबे से दूसरे सूबे में या फिर मुग़ल दरबार मे बतौर वजीर किया जाता था।

अकबर से औरंगज़ेब तक ये व्यवस्था कायदे से चली। अवध भी इन्हीं सूबों मे से एक था जो काफी जरखेज और धनी भी था। औरंगज़ेब की मौत के बाद कमज़ोर मुग़ल शासकों के दौर में ज्यादातर सूबेदार खुदमुख्तार हो गए और अपने अपने सूबों पर उन्होंने अपना वंशानुगत शासन स्थापित कर लिया।

ऐसे ही एक सूबेदार थे सादात खान बुरहनुल्मुल्क। उन्हें बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला ने 1727 में अवध का सूबेदार बना कर भेजा, तब से 1856 तक अवध पर उन्हीं के वंश का शासन रहा, जिसमें आखिरी नवाब वाजिद अली शाह थे।

इसी वंश मे तीसरे नवाब हुए शुजाउद्दौला, जिन्होंने कई लड़ाई लड़ी और जीती भी। लेकिन 1764 में हुई बक्सर की लड़ाई में वे अंग्रेज़ों से हार गए। बदले में उन्हें 50 लाख रुपए जुर्माना देना पड़ा और यह तय हुआ कि अब से अवध राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियुक्त रेजिडेंट की निगरानी में रहेगा ताकि नवाब के शासन पर निगाह रखी जाए और ज़रूरत पड़ने पर नवाब को सलाह और सैन्य सहायता दी जाए। इस बाबत बाकायदा संधि हुई।

इस समय से लेकर नवाब मुहम्मद अली शाह 1837-42 के समय तक कई और संधि नवाब और कंपनी के बीच अवध के शासन को लेकर हुई जिसमें नवाब पर कई बंदिशे लगीं लेकिन नवाब के शासन करने का अधिकार बरकरार रहा।

इसी बीच हिंदुस्तान की राजनीति में नया मोड़ आया और लॉर्ड डलहौजी ईस्ट इंडिया कंपनी का गवर्नर जनरल बना। उसने नवाब को गद्दी से उतार कर चाहा की अवध पर कंपनी का शासन हो। इसमें बाधा थीं कंपनी और अवध राज्य के बीच हुई पूर्व संधियां और उस समय अवध के नवाब थे वाजिद अली शाह।

हालांकि ये संधियां कई बार अवध राज्य के लिए फायदेमंद नहीं थीं लेकिन नवाबों ने हमेशा संधि की इज्जत की, इसलिए अवध पर कब्ज़ा करना नैतिक और कानूनी दोनों तरह से मुश्किल था। कंपनी बोर्ड के डायरेक्टर्स इस बात को समझते थे, इसलिए अवध पर कब्जा करने से हिचक रहे थे।

आखिकार डलहौजी ने संधि में से ही रास्ता निकाला और जनरल आउट्रम को अवध का दौरा कर नवाब पर राज्य में बद इंतजामिया फैलाने का आरोप लगाने को कहा। ऐसा ही हुआ भी, लेकिन फिर एक पेच फंसा, व्यवस्था खराब होने पर कंपनी को उसे सुधारने मे नवाब की मदद करनी थीं, जबकि डलहौजी इसी को आधार बना कर नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से उतार कर अवध पर कब्जा करना चाहता था, लेकिन संधि की धाराओं से वाकिफ बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं दी।

नवाब की माता मलिका किश्वर का नवाब और रियासत दोनों पर खासा अख्तियार था। डलहौजी ने उन पर दबाव बनाने की सोची और आउट्रम को मलिका के पास भेजा की वो नवाब को समझाएं कि 15 लाख सालाना की पेंशन और नवाबों की सारी जायदाद महल, कोठियां वगैरह लेकर, गद्दी खुद ही छोड़ दें और आराम से लखनऊ मे रहें। इस तरह अवध पे कब्ज़ा भी हो जाता और संधि की बंदिश की काट भी हो जाती।

आउट्रम ने मलिका किश्वर से ये पेशकश की तो मलिका ने उससे पूछा कि क्या कंपनी ने महारानी विक्टोरिया से इजाजत ली है क्योंकि नवाब और कंपनी दोनों ही विक्टोरिया के अधीन हैं। जाहिर है आउट्रम निरुत्तर हो गया। मलिका जानती थीं, नवाब की गद्दी तो जाएगी ही, लेकिन उन्हें आगे की कारवाई के लिए एक कानूनी पेच चाहिए था जो उन्हें मिल गया। जारी…

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