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लखनऊ की मलिका किश्वर की नज़ीर – पार्ट 2

अधूरा रह गया भारत और इंग्लैंड के रिश्ते का एक और आयाम

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इधर नवाब ने भी गद्दी छोड़ने से इंकार कर दिया। नतीजे में कंपनी ने अवध पर कब्जा कर लिया और नवाब को लखनऊ छोड़ कलकत्ते मटिया बुर्ज के लिए रवाना किया। उनकी पेंशन भी घटा कर 15 से 12 लाख रुपए सालाना कर दी गई।

13 फरवरी 1856 को नवाब वाजिद अली शाह मटिया बुर्ज के लिए रवाना हो गए। रास्ते में काशी नरेश के निमंत्रण पर वो तीन दिन वाराणसी में नदेसर कोठी में रुके। यहां काशी विश्वनाथ मंदिर को एक लाख रुपए का दान भी दिया।

कंपनी के निर्णय के विरोध स्वरूप करीब छह हजार लोग भी नवाब के साथ ही मटिया बुर्ज जाकर बस गए। ये सब हो ही रहा था कि अवध मे विद्रोह हो गया और लोग अंग्रेज़ों के खिलाफ मरने मारने पर आमादा हो गए, जबकि नवाब ने लोगों से अमन बनाए रखने को कहकर लखनऊ छोड़ा था।

अब नवाब ने इंग्लैंड जाकर मलिका विक्टोरिया से मिलने का निर्णय किया लेकिन वो बीमार पड़ गए तो सारी बातों से वाकिफ उनकी माता मलिका किश्वर ने इस काम को अंजाम देने का बीड़ा उठाया।

सारे लाव लश्कर के साथ मलिका इंग्लैंड रवाना हुईं। सारे कानूनी हालत से वाकिफ मसीहुद्दीन भी उनके साथ थे, जिनकी कोठी आज भी मलिहाबाद में है। मसीहुद्दीन के नाती अब्दुल हलीम शरर जिनका बचपन मटिया बुर्ज में बीता ने इस मुकदमे का तफसील से वर्णन लिखा है।

उनकी प्रसिद्ध किताब गुजिश्ता लखनऊ में भी इस मुकदमे का ज़िक्र है। लेडी लेविलिन जोन्स जिन्होंने अवध पर बहुत काम किया है उन्होंने भी इस मुकदमे पर तफसील से लिखा है।

बहरहाल जब तक मलिका इंग्लैंड पहुंचीं अवध में जबरदस्त विद्रोह हो चुका था और ईस्ट इंडिया कंपनी के भी पैर यहां से उखाड़ चुके थे। इंग्लैंड पहुंचने के बाद मलिका किश्वर ने मलिका विक्टोरिया से मिलने की दरख्वास्त की।

विक्टोरिया बहुत खुले दिल से मलिका किश्वर से मिलीं और राजमाता होने के नाते मलिका किश्वर को बेहद सम्मान दिया। लेकिन कानूनी पेच वहां ये फंसा कि मलिका विक्टोरिया के वकीलों ने उन्हें ये बताया कि विवाद का क्षेत्र अवध तो फिलहाल विद्रोह के कारण इंग्लैंड के कब्जे में भी नहीं है, इसलिए मुकदमे का आधार क्या होगा?

कानूनी नुक्ता दुरुस्त था इसलिए विक्टोरिया ने मलिका किश्वर से अवध पर फिर से कब्ज़ा होने तक इंतजार करने को कहा। मलिका विक्टोरिया ने कहा फिलहाल तो वो क्षेत्र हमारा भी नहीं तो फिर मुकदमा किस इलाके के लिए सुना जाए, इसलिए आप अवध के फिर से इंग्लैंड के कब्जे में आने तक इंतज़ार करें, मुकदमे की सुनवाई तब तक के लिए स्थगित की जाती है।

विद्रोह भीषण था, वो कब तक काबू में आएगा ये तय नहीं था इसलिए मलिका किश्वर ने लौटना तय किया और मसीहुद्दीन को वहीं इंग्लैंड मे रुकने को बोला ताकि उचित समय पर मुकदमा फिर से शुरू किया जा सके।

इसके बाद मलिका किश्वर ने वापसी का सफर शुरू किया लेकिन वृद्धावस्था, चिंता और थकान की वजह रास्ते में फ्रांस में ही उनका निधन हो गया और फ्रांस की सरकार ने वहीं पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ मलिका किश्वर का अंतिम संस्कार संपन्न कर दिया।

मलिका किश्वर भले नहीं रहीं लेकिन अपने पीछे मुकदमा और पैरोकार वो छोड़ गई थीं इसलिए विद्रोह खत्म होने के बाद मसीहुद्दीन ने फिर मामला अदालत के सामने रखा और सुनवाई भी हुई, अदालत ने वाजिद अली शाह का पक्ष जानना चाहा।

इस बीच एक परिवर्तन और हो चुका था। मटिया बुर्ज में नवाब और उनके मुसहिबीन कायदे से व्यवस्थित हो चुके थे और भरपूर आनन्द का जीवन जी रहे थे। नवाब ने एक तरह से दूसरा लखनऊ ही वहां बसा दिया था।

मुसाहिबीन ने आपस में सोचा कि मुकदमा जीतने के बाद अगर शाह वापस लखनऊ जाते है तो फिर वहां मसीहुद्दीन की ही चलेगी और बाकी किसी की और कोई पूछ नहीं रहेगी। सो उन सबने शाह को समझाया कि हुज़ूर मुकदमे से कहीं सल्तनत वापस मिलती है और अगर मिल भी गई तो लूटे हुए अवध को लेकर आप करेंगे क्या?

मुसाहिबीन की चाल काम कर गई और वाजिद अली शाह ने मुकदमे से किनारा कर लिया, ज़ाहिर सी बात है मसीहुद्दीन भी क्या करते और यह किस्सा खत्म हुआ।

लेकिन यह किस्सा खत्म नहीं हुआ, बदकिस्मती ने खत्म करा दिया। फ़र्ज़ कीजिए मलिका किश्वर ज़िंदा होती तो भरपूर पैरवी के साथ नतीजा कुछ और ही होता। इतिहास में बहुत सी घटनाएं ऐसी है जो अपनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंची, न्यस्त स्वार्थों से उनका कुछ और ही अंत हुआ, यह मुकदमा भी ऐसा ही था।

इसकी चर्चा भले इतनी ना हुई हो लेकिन कानून के राज को मानने के अंग्रेजों के दावे की पुष्टि तो करती ही है। आप इसको दिखावा भी कह सकते हैं, लेकिन जीते हुए पक्ष ने हारे हुए पक्ष का मान तो रखा ये क्रेडिट तो कम से कम अंग्रेज़ों को मिलना ही चाहिए।

प्रसंगवश यहां ये भी जान लीजिए हुसैनाबाद की पिक्चर गैलरी जिसमें सारे नवाबों के चित्र लगे हैं, अंग्रेजों ने ही बनाई ताकि नवाबों की याद बनी रहे। (समाप्त)

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