The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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लखनऊ को बेचिए, लेकिन ज़रा सलीके से

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व्यवसाय के इस कलिकाल में सब कुछ बेच डालने का रिवाज़ है। पर्यटन भी ऐसी ही एक जिंस बनकर रह गया है, शायद इसीलिए जब पर्यटन व्यवस्था की सफलता को मापना होता है, तो कहा जाता है इतने करोड़ का बिज़नेस हुआ। यह नापने का कोई पैमाना नहीं बना कि पर्यटन से कहीं की सभ्यता से कितने लोग प्रभावित हुए, हो सकता है किन्हीं और देशों में ऐसा हो, अपने यहाँ तो नहीं ही है। हाँ, अपने यहाँ यह ज़रूर है की ज्यादा माल बटोरने के चक्कर में पर्यटकों के सामने हम खुद ही अपनी सभ्यता की ऐसी-तैसी कर डालते हैं।

अब ऐसे में ज़ाहिर सी बात है, लखनऊ की बिक्री भी कुछ इसी अंदाज़ में हो रही है। मैं भी इस माल का खरीदार हूँ, इसलिए अपने साथ ही घटे एक-दो वाक़ये बताना यहाँ मौजू होगा। अक्सर बाहर से मिलने लोग जब आते हैं तो लखनऊ भी घूमना चाहते हैं, ऐसे में मुझे भी उनका साथ देना पड़ता है। एक बार एक दोस्त के साथ पिक्चर गैलरी गया। आपको बता दें कि पिक्चर गैलरी की स्थापना कर वहां अवध के नवाबों के पोर्ट्रेट लगवाने का काम अंग्रेजों ने किया ताकि आने वाली जनरेशन के लिए सनद रहे। बहरहाल दोस्त के साथ जब वाजिद अली शाह के चित्र के सामने पहुंचे तो गाइड ने बताया की नवाब अजगर का गोश्त भी खाते थे, क्योंकि 365 बेगमों का स्वामी होने के नाते ऐसा करना उनकी ज़रूरत भी थी।

अब इसे खुशकिस्मती कहें या बदकिस्मती लखनऊ नामक जिंस की थोड़ी-बहुत पहचान मुझे भी है, सो मैंने उस गाइड से पूछा यह नायाब जानकारी तुम्हें कहाँ से मिली? वो सकपका गया और बोला साहब लोगों को इन्ही सब किस्सों में मज़ा आता है, इसलिए हम लोग यही सब बताते हैं, जो बुजुर्गों से बतौर किस्से सुना। हम लोगों को न कोई कुछ बताता है, न किसी किस्म की कोई ट्रेनिंग दी जाती है। मैंने भी हंसकर उसे आगे से ऐसा न करने की ताकीद की, जो पक्की बात है उस गाइड ने नहीं मानी होगी, क्योंकि उसके पास बताने के लिए कोई तथ्यात्मक जानकारी थी ही नहीं। ऐसे ही एक और जानकार गाइड ने बताया कि बड़ा इमामबाड़ा तो नवाब आसफुद्दौला ने बनवाया लेकिन रूमी गेट की तामीर उसके काफी बाद नवाब नसीरुद्दीन हैदर ने कराई। गाइड ने यह भी कि बताया अभी वो संविदा पर है, पक्का हो जाने के बाद और बेहतर जानकारी लोगों को दिया करेगा।

आप में से भी जो हज़रात इन लाइनों को पढ़ रहे होंगे, उनमे से कईयों का सामना ऐसे ज्ञानिओं से पड़ा होगा जिन्होंने बताया होगा कि अंग्रेजों के भय से जब सब भाग रहे थे, वाजिद अली शाह इसलिए नहीं भागे क्योंकि उन्हें जूता पहनाने वाला कोई नहीं मिला। कुल मिला कर लखनऊ आने वाले ज्यादातर पर्यटक इसी किस्म कि बेसिरपैर कि जानकारियाँ लेकर वापस जाते हैं, वह तो भला हो बड़े और छोटे इमामबाड़े का कि लखनऊ की थोड़ी बहुत बिक्री हो जाती है, वर्ना हमारे पास लखनऊ के नाम पर कुछ खंडहरों और गप्पों के अलावा कुछ नहीं है। जब कि वास्तविकता बिलकुल अलग है, लखनऊ मध्यकालीन भारत के सुन्दरतम शहरों में से एक था, दुर्भाग्य से 1857 की लड़ाई में यह काफी बर्बाद हो गया, लेकिन फोटोग्राफर लखनऊ में 1844-45 के आसपास आ गए थे, इसलिए लखनऊ अपनी पूरी भव्यता के साथ फोटोग्राफ्स में मौजूद है। इन फोटोग्राफ्स को सलीके से प्रदर्शित कर, पर्यटकों को लखनऊ की भव्यता से परिचित कराया जा सकता है। लेकिन तय है, ऐसा नहीं होगा।

उसी तरह लखनऊ की नवाबी का गौरवशाली इतिहास है, ऐसा नहीं है कि उसमें सब कुछ चमकीला ही है, लेकिन कुल मिलाकर लखनऊ की नवाबी ऐसी थी कि आखिरी नवाब को हटाना 1857 कि लड़ाई के प्रमुख कारणों में से एक बना, जबकि अंग्रेजों के पैर हिंदुस्तान से लगभग उखड़ गए थे। ऐसे गौरवशाली इतिहास की बुकलेट पर्यटकों के लिए तैयार कराना भी बेहतर बिक्री का एक सलीका हो सकता है, जो नहीं किया जायेगा। अपने यहाँ ऐसा नहीं है कि यह सलीका किसी को नहीं मालूम। राजस्थान घूम आइए, आपको सब कुछ व्यवस्थित और शानदार मिलेगा, वहां के गाइड आपको गप्प नहीं सुनायेंगे, वहां का इतिहास बताएँगे। इसके उलट हम लखनऊ में क्या कर रहे हैं? 2-4 मामूली जानकार गाइड हैं जो वीआईपी विजिट पर उन्हें थोड़ी बहुत जानकारी दे देते हैं और कुछ पेशेवर हैं जो उनके सामने नाच गा देते हैं, बस इसी तरह लखनऊ की बिक्री हो रही है। ज़ाहिर है ऐसी ख़राब बिक्री से माल कम बिकता है, इसीलिए लखनऊ में पर्यटन का हाल बेहाल है। हाँ, यह ज़रूर है कि बीच-बीच में ठग दुकानदार उसी पुराने माल की पैकेजिंग बदल कर उसे नए सिरे से बेचने की जुगत में तो लगे ही रहते हैं।

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