The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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महाभारत ज़रूर पढ़ें, दुनिया बेहद आसान लगेगी

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सबसे पहले तो यह बता दूं कि यह आर्टिकल मैं भड़ास फेम यशवंत सिंह के कोंचने पर लिख रहा हूँ। न सिर्फ यह बल्कि अगला हिन्दुत्व पर लेख भी इसी कोंचने का ही नतीजा होगा। एक दिन यशवंत ने अपने फेसबुक पर लिखा कि राजनीति और दूसरे चलताऊ विषयों के अतिरिक्त भी लिखा जाना चाहिए लेकिन लोग नहीं लिखते। बात जायज़ है और उसी समय किसी सन्दर्भ में मुझे महाभारत पर लिखी एक टिप्पणी याद आई, जिसमें कहा गया है कि भूत, भविष्य और वर्तमान में जो कुछ भी हुआ, होगा या हो चुका है वह सब महाभारत में है और अगर वो महाभारत में नहीं है तो वो न है, न हो चुका है और न ही होगा।

महाभारत से जुड़ी इस गर्वोक्ति को मैंने करीब 30 साल पहले, पहली बार सुना था। पढ़ लिख कर बेरोजगार था तब भी पढ़ने-लिखने में ही फ़ालतू समय बिताता था, उसी समय एक सज्जन ने चर्चा के दौरान इस गर्वोक्ति का ज़िक्र किया। बड़ा कौतूहल हुआ कि क्या ऐसी सार्वकालिक प्रासंगिक किताब हो भी सकती है? फिर सोचा कि सनातन धर्म के बारे में बहुत सी गप्पें प्रचलित हैं, यह गर्वोक्ति भी उसी तरह की एक गप होगी। लेकिन बचपन में महाभारत की कहानियाँ सुनी थीं और बाद में सीरियल भी देखा था इसलिए यह महाकाव्य कम से कम मनोरंजक तो है ही इसमें संदेह नहीं था, इसलिए गर्वोक्ति को भी परखने का निर्णय लिया और गीता प्रेस की महाभारत 300 रुपये में ले आया। ले तो आया लेकिन उस विशाल कलेवर को देख महीनों पढ़ने की हिम्मत नहीं पड़ी बहरहाल फिर पढ़ना शुरू किया।

फिर तो जैसे जैसे इसे पढ़ता गया वैसे वैसे गर्वोक्ति की प्रासंगिकता भी बढ़ती गयी और मज़े की बात इतना शानदार महाकाव्य लिखने वाले की निरासक्ति के प्रति भी सिर श्रद्धा से झुक गया। मुझे इस महाकाव्य ने इतना प्रभावित किया, इसका कारण शायद यह भी हो सकता है कि मैं इतिहास का विधार्थी रहा हूँ। न चाहते हुए भी मुझे महाभारत के चरित्रों में इतिहास के विभिन्न काल खण्डों के चरित्र दिखने लगे। लगा कि महाकाव्य में जो लिखा है उसी का तो मंचन बार-बार विभिन्न घटनाओं के रूप में इस संसार में हो रहा है। आप भी एक प्रसंग देखिये। इस प्रसंग ने कम से कम मुझे तो बहुत ही ज्यादा प्रभावित किया।

महाभारत का युद्ध शुरू होने के पहले भगवान कृष्ण विजय का आशीर्वाद लेने भीष्म पितामह के यहाँ गए। पितामह ने कहा राजन आशीर्वाद तो तुम्हें दिया लेकिन मेरी एक शंका का समाधान भी करो, पितामह ने श्रीकृष्ण से कहा युद्ध का कारण मैं समझता हूँ, दोनों ही पक्ष इसके लिए कमोबेश ज़िम्मेदार हैं इसलिए दोनों ही पक्ष सांघातिक रूप से नष्ट होंगे। लेकिन एक चीज़ नहीं समझ पा रहा हूँ, इस युद्ध में हस्तिनापुर की जनता भी आंशिक रूप से नष्ट होगी उसका क्या कसूर? श्रीकृष्ण ने अपनी भुवन मोहिनी हंसी के साथ कहा पितामह इसका जवाब बहुत आसान है और आप जानते भी हैं लेकिन मोहवश कुछ भी करने में असमर्थ हैं। श्रीकृष्ण ने जवाब देने के क्रम में उदाहरण दिया कहा, जब कौरवों ने पांडव भाईओं को लाक्षागृह में जलाकर मार डालने का षड्यन्त्र रचा और कालान्तर में यह बात हस्तिनापुर की जनता को मालूम हुई तो क्या जनता का कर्तव्य नहीं बनता था कि ऐसे पापी राजकुल को नष्ट कर देती?

श्रीकृष्ण ने दूसरा उदाहरण दिया बोले, जिस समय भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था और आप भी उसे देख रहे थे, कालान्तर में हस्तिनापुर की जनता को भी ये बात पता चली तो क्या जनता को ऐसे पापी राजकुल को नष्ट नहीं कर देना चाहिए था? श्रीकृष्ण ने पितामह से कहा राजन पाप में प्रत्यक्ष रूप से भागीदार कौरव और पांडव पूरी तरह से नष्ट होंगे और अप्रत्यक्ष रूप से भागीदार हस्तिनापुर की जनता आंशिक रूप से नष्ट होगी, इसमें न समझ में आने वाली तो कोई बात नहीं? श्री कृष्ण ने और भी उदाहरण दिए थे, आर्टिकल लम्बा न हो जाए इसलिए मैंने दो का ही ज़िक्र किया।

अपने देश के ही सन्दर्भ में इस उदाहरण को परखें, जब तक आम लोगों ने अनदेखी की, अँगरेज़ हिंदुस्तान पर शासन करते रहे जब आम जन ने चाह लिया उन्हें उखाड़ फेंका। धृतराष्ट्र का पुत्रमोह तो मुहावरा ही बन गया है। एक और प्रसंग देखें जब श्री कृष्ण की अतुलनीय शक्ति की छाया तले उनके परिजन ही कुमार्गी हो गए तो उन्हें भी उनके हाल पर छोड़ने में श्रीकृष्ण ने देर नहीं की। आज भी घर घर में नाकारा संतानों को बचाने के चक्कर में कितना अनर्थ होता है। पूरी महाभारत पढ़ जाएँ, हर सांसारिक समस्या से निपटने के सन्दर्भ में कोई न कोई वृत्तान्त मिलेगा। आधुनिक सन्दर्भ में उस वृत्तान्त का भाष्य करिए हल मिल जायेगा और थोड़ा ठहर कर देखिये तो हल होता भी महाभारत में दिए तरीके से ही है, आप चाहें या ना चाहें।

मुझे नहीं मालूम कहाँ से ये बात निकली कि महाभारत न तो पढ़नी चाहिए ना ही घर में रखनी चाहिए। इसकी ठीक उलटे मेरा तो यह मानना है कि महाभारत को केन्द्र में रखकर सर्वाधिक प्रवचन होने चाहिए ताकि लोग संसार को बेहतर तरीके से समझें और तदनुसार आचरण करें। चलते चलते एक उदाहरण और मनुष्य के जीवन में सबसे अधिक समस्याएं उसके अहंकार से ही पैदा होती हैं, भगवान श्रीकृष्ण ने अहंकार को त्याग कर जीवन का आनंद लिया, इसके दसियों उदाहरण महाभारत में मिल जायेंगे अब कोइ इन प्रसंगों से सीख न ले तो क्या किया जा सकता है।

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