The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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डॉक्टरों की मार–पीट की वजह तलाशना बेहद ज़रूरी

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किसी भी दिन का अखबार उठा कर देख लीजिये, अक्सर ये पढ़ने को मिल जाएगा कि किसी अस्पताल में डॉक्टरों ने मरीजों को पीटा या मरीजों ने डॉक्टर को। इस को पढ़कर आपके दिमाग में डॉक्टर्स की बाबत नकारात्मक छवि बननी लाजिमी है, तभी आपके सामने कभी–कभी एक और खबर आयेगी कि काम के बोझ से कम से कम जूनियर डॉक्टर्स की हालत खराब है। रुकिए अभी एक और खबर बची है वो ये कि मेडिकल कॉलेज के समारोह में नए–नए डॉक्टर बने युवक–युवतियों में से कई ने कहा कि वे गरीब मरीजों के इलाज के लिए काम करना चाहते हैं।

फिर ऐसा क्या हो जाता है कि जब गरीबों के इलाज का मौक़ा मिलता है तो डॉक्टर मार–पीट पर उतारू हो जाते हैं और मरीज़ भी पीछे नहीं रहते। ऐसा होने की कई वजहें तो एकदम साफ़ हैं लेकिन एक वजह पर लोग बिलकुल भी ध्यान नहीं देते, जबकि मार–पीट की सबसे बड़ी वजह शायद वही है। सरकारी अस्पतालों में दो व्यवस्थाएं समानांतर रूप से चलती हैं। एक तो मरीज़ देखना और उनका इलाज करना, दूसरे ये काम सुचारू रूप से हो सके इसके लिए प्रशासनिक व्यवस्था करना। अस्पतालों में अक्सर जो भी दिक्कतें होती हैं, उनमें से अधिकाँश प्रशासनिक कमियों की वजह से ही होती हैं, जिनको दूर करना सामान्य डॉक्टर के बस में होता ही नहीं। दूसरी तरफ वे मरीज़ या उनके परिजन जिनको व्यवस्थाजन्य कमियों की वजह से नुकसान होता है, उनके सामने नाराजगी जताने के लिए, इलाज करने वाले डॉक्टर ही पड़ते हैं और हताशा में वे उनसे ही उलझ पड़ते हैं।

अपने समाज में ये कमी तो फिलहाल है ही कि जहां कहीं भी पैसे का दखल होता है, बेईमानी शुरू हो जाती है। अस्पतालों में भी यही होता है, नए निर्माण, दवाओं की खरीद, नए उपकरण लगाने और दूसरी कई मद में सरकार हर साल अरबों रुपये स्वीकृत करती है। इसकी बंदरबांट नेताओं, अफसरों और ठेकेदारों की तिकड़ी मिलकर कर लेती है, नतीजे में सरकारी अस्पतालों में हर समय अव्यवस्था बनी रहती है। मज़े की बात इसे रोकने में उस सामान्य डॉक्टर की कोई भूमिका नहीं होती जो चिकित्सा व्यवस्था के केन्द्र में होता है और इसीलिये आजकल आये दिन मार खाता है या मार–पीट करता है।

इस सामान्य से विश्लेषण का ये मतलब कतई नहीं है कि डॉक्टर्स में कोई कमी नहीं है, वे भी समाज के बाकी हिस्सों की तरह बेईमान, कामचोर और सुविधाभोगी हो गए हैं जो इस पेशे के लिहाज़ से ठीक नहीं है, लेकिन लगातार खराब हो रही चिकित्सा व्यवस्था के बड़े गुनाहगार वे नहीं हैं और जो हैं उनका सामना झल्लाए परिजनों से नहीं होता। अगर कभी बड़े वाले पकड़े भी जाते हैं तो उनका सामना पुलिस और अदालतों से होता है, जो भीड़ की मानसिकता वाले मार–पीट के तत्काल न्याय में भरोसा नहीं करते। अपने यहाँ चिकित्सा व्यवस्था भी दूसरी व्यवस्थाओं की तरह धीरे धीरे ही खराब हुई, लेकिन यहाँ सीधे जान चली जाती है, इसलिए नाराज़गी कुछ ज्यादा ही मुखर होकर सामने आती है।

सन 1985–90 तक अपने सूबे में अस्पतालों की हालत कुल मिलाकर ठीक-ठाक थी। इस के बाद कई कारक एक साथ सक्रिय हो गए, बड़ी आबादी ने शहरों में रहना शुरू किया, लोग चिकित्सा को लेकर जागरूक भी हुए लेकिन ज्यादा आबादी की वजह से सरकारें चाह कर भी उनके लिए सुविधाएँ नहीं जुटा पाई, चाहे वो संसाधन हों या ज्यादा संख्या में कुशल डॉक्टर। जैसा कि अपने यहाँ आजकल हल्ला है कि निजी क्षेत्र को सब कुछ दे दो वे सब ठीक कर देंगे, सो अपने यहाँ भी ये प्रयोग शुरू हुआ। बड़ी संख्या में निजी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज खुले और जैसा कि अपने यहाँ रिवाज़ है, कुछ को छोड़कर ज्यादातर लूट के अड्डों में तब्दील हो गए, इस वजह से भी सरकारी अस्पतालों पर भार कम होने के बजाए बढ़ता ही गया। कुल मिलाकर ये कहना उचित होगा कि अभी लम्बे समय तक पीटने–पिटने की घटनाएँ मीडिया में प्रमुखता से आएँगी। यह कष्टदाई तो है, लेकिन सच यही है।

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