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राष्ट्रोत्थान की फेसबुकी टिट्टिभि प्रवृत्ति

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इस आर्टिकिल की शुरुआत की जाये इससे पहले टिट्टिभि प्रवृत्ति पर चर्चा लाजिमी है। हालांकि यह एक मिथिकीय कथा है। माना जाता है कि टिट्टिभि (टिटिहिरी) नामक बेहद छोटा पक्षी जब सोता है तो पंजे आसमान की तरफ कर लेता है। टिटिहिरी का मानना है कि उसकी निद्रा की दौरान अगर आसमान फट पड़े तो अपने पैरों पर वह उस बोझ को सम्भाल लेगी और धरतीवासियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचने देगी। टिटिहिरी की यह प्रवृत्ति काबिले गौर और काफी हद तक हास्यास्पद है। भले वह गिरते आसमान को रोक पाये या नहीं।

यह टिट्टिभि प्रवृत्ति अनादिकाल से चली आ रही है और फेसबुक एकदम अधुनातन संरचना है। ऐेसे में टिटिहिरी की प्रवृत्ति और फेसबुक के अद्भुत संयोग से एक खास तरह की प्रजाति कम से कम भारत भूमि पर अवतरित हो चुकी है। अकिंचन और अल्पशिक्षित प्राणी हूं, इसलिए फेसबुकी टिट्टिभि प्रजाति के ऐसे अनोखे लोग शेष धरती पर और कहीं पाये जाते हैं या नहीं यह मुझ गरीब को फिलहाल नहीं मालूम। बहरहाल अपने भारत देश की धरा पर वे काफी बहुतायत से पाये जाने लगे हैं। खास तौर से भाजपा की केन्द्र सरकार बनने के बाद। ये फेसबुकी टिटिहिरियां अपने-अपने फेसबुक वाल को युद्ध का मैदान समझकर युद्ध में जुटी हुई हैं और इनका मानना है कि राष्ट्र उन्हीं की वजह से टिका है वर्ना कब का रसातल में चला गया होता।

मानव की तरह टिटिहिरी की भी कई प्रजातियां होती होंगी, ऐसा मैं मान लेता हूं। हर जीव की कई प्रजातियां होती हैं तो टिटिहिरी की भी होती ही होंगी। सो फेसबुक की वाल पर पैर उल्टा कर राष्ट्रोत्थान में जुटी ये टिटिहिरियां अलग-अलग नेताओं और दलों के प्रति प्रतिबद्ध हैं। अपने-अपने देवताओं के समर्थन में किसी भी हद तक जाकर शीर्षासन करने में उन्हें कोई परहेज नहीं है। सही मायनों में जान जोखिम में डालकर देश के लिए सड़क पर संघर्ष करने वाले लोग जब कुछ सही या गलत कर चुकते हैं तो ये फेसबुकी टिटिहिरियां एक दम से सक्रिय हो जाती हैं। पाठकों आप में से अधिकांश के पास फेसबुक अकाउण्ट होंगें और आप भी इन टिटिहिरियों के शीर्षासनी कुतर्क पढ़कर चमत्कृत होते ही होंगे, इसलिए इस पर बहुत ज्यादा चर्चा जरूरी नहीं है।

मुझे याद है बचपन से लेकर अभी हाल ही तक ड्राइंग रूम में बैठकर राजनीतिक चर्चा करने वालों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता था। ये करें-धरेंगे कुछ नहीं खाली जुबान चलायेंगे। मानो इसी से देश का भला होगा। फिर भी तबका मध्य वर्ग कम से कम चर्चा के बहाने सरोकार तो दिखाता था। उनके तर्कों में दम होता था और ये तर्क तथ्यों पर आधारित होते थे। अब उनका यह स्थान इन फेसबुकी टिटिहिरियों ने ले लिया है। दिल्ली में बैठे और खासे काबिल साथ ही ऐसी फेसबुकी गतिविधियों से वाकिफ मेरे एक मित्र ने मुझे बताया है कि उनमें से बहुत सारी टिटिहिरियां तो बाकायदा पेड हैं। उन्हें ऐसा करने के लिए पैसा मिलता है। इतने बड़े और ज्ञानी आदमी हैं तो सही ही बता रहे होंगे।

हालांकि इन टिटिहिरियों से इतर अपनी-अपनी विचारधारा के पक्ष में लड़ने-जूझने वाले तमाम लोग बड़ी संख्या में मौजूद हैं। जो जान जोखिम में डालकर अपने वर्ग से लेकर देश तक के उत्थान की लड़ाइयां लड़ रहे हैं। वे सही या गलत हो सकते हैं लेकिन उनकी मंशा चरित्र और लड़ाई के प्रति उनकी प्रतिबद्धता काबिल-ए-तारीफ है। वे हार सकते हैं, वे जीत भी सकते हैं, लेकिन वे सचमुच के योद्धा हैं, जो लड़ाई जमीन पर लड़ रहे हैं फेसबुक की वाल पर नहीं। इन्हीं टिटिहिरियों की एक और प्रजाति भी है इन्हें फेसबुकी टिटिहिरियां तो नहीं कह सकते लेकिन काम वे ऐसा ही करते हैं। इस प्रजाति में खास तौर से हिन्दी पत्रिकाओं, अखबारों के सम्पादक, मालिकान आते हैं।

सारे धतकरम करने के बाद जब यह सम्पादकीय लिखते हैं तो लगता है कि महराज हरिश्चन्द्र के बाद अब जम्बूद्वीप की धरा पर यही अवतरित हुये हैं। उन लेखों से यह ध्वनि भी निकलती है अगर इन लेखों को पढ़ा नहीं गया तो निश्चित रूप से कम से कम भारत वर्ष में प्रलय आ ही जाएगी। खैर यह सब संसार है, सब चलता है। लेकिन यह टिटिहिरियां जो कर रही हैं, उससे जल्दी ही हिन्दी भाषी पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की जो बची-खुची साख है वह भी मिट्टी में मिल जाएगी। यह सब तो होगा ही साथ ही यह टिटिहिरियां जो यह सोच रही हैं कि देश उनके उल्टे पैरों पर ही टिकेगा, तो उनकी इस खामख्याली को क्या कहा जाये ? मूर्खता का कोई तोड़ नहीं है। जम्बू द्वीप का जो अच्छा या बुरा होगा, जमीन पर लड़ रहे लोगों द्वारा ही होगा, इन फेसबुकी टिटिहिरियों से तो कतई नहीं।

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