The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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नित-नए पाठ्यक्रम और ठेके की नौकरियां

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अभी थोड़े दिन हुए अखबार में खबर दिखी कि लखनऊ यूनिवर्सिटी ने अपने यहाँ के तमाम सेल्फ फाइनांस कोर्सेज पढ़ाने बंद कर दिए और जो बचे हैं उनमें से अधिकाँश में पढ़ने के लिए विद्यार्थी नहीं आ रहे हैं। बात यहीं रुक जाती तो भी ग़नीमत थी। ख़बरें ये भी हैं कि तमाम दूसरे संस्थानों ने भी सरकार से कई पुराने कोर्सेज बंद कर नए पाठ्यक्रम शुरू करने की इजाज़त मांगी है। इस रोचक विरोधाभास से जुड़ी एक दिलचस्प सच्चाई यह भी है कि इतने सारे पाठ्यक्रमों की भूल-भुलैय्या से गुजरने के बाद लड़के-लड़कियां जब रोज़गार के बाज़ार में दाखिल होते हैं, तो उन्हें ठेके की 8-10 हज़ार रुपये माहवार की नौकरियों के अलावा और कुछ नहीं मिलता।

यह दिलचस्प विरोधाभास कैसे सम्भव हुआ इसे समझना भी मज़ेदार अनुभव है, आइए कोशिश करें, दरअसल करीब बीस-पचीस साल पहले हमारे हुक्मरान को इल्हाम हुआ कि हिन्दुस्तान को अब अमरीका बन जाना चाहिए, इतनी सलाहियत अब मुल्क में आ चुकी है। बस आनन–फ़ानन इस काम को अमली जामा पहनाने की तय्यारियाँ शुरू हो गईं। ये काम तो कई मोर्चों पर एक साथ शुरू हुआ लेकिन अभी बात केवल पढ़ाई और रोज़गार मोर्चे की। यह तय पाया गया कि अमरीका बनने की प्रक्रिया में नई जनरेशन को कई नए काम करने होंगे और रोज़गार के तमाम नए अवसर भी सामने आयेंगे। इसके लिए उन्हें काबिल बनाना होगा।

अब ज़ाहिर सी बात है काबिलियत के लिए पढ़ाई बहुत ज़रूरी है इसलिए तमाम नए कोर्सेज शुरू कर दिए गए मसलन होटल मैनेजमेंट, फैशन डिजाइनिंग, मीडिया और पर्यटन प्रबंधन सरीखे कोर्स। कोर्स शुरू तो हुए लेकिन इस एहतियात के साथ कि पढ़ाई का पूरा खर्चा विद्यार्थी ही उठायें क्योंकि अमरीका में ऐसा ही होता है। अब जब सरकार ऐसे नेक काम में जुट गयी तो लोग भी क्यों पीछे रहते। रातों रात नए कोर्सेज में दाखिला लेने वालों की भीड़ लग गयी। पता नहीं कहाँ से इन नए कोर्सेज को पढ़ाने के लिए एक्सपर्ट्स भी प्रकट हो गए और सिलसिला चल निकला। एक समय तो हालत यहाँ तक हो गयी कि परंपरागत कोर्स पीछे छूट गए, बड़ी संख्या में लोग अमरीका रूपी नए हिन्दुस्तान में मिलने वाले अवसरों का लाभ लेने के लिए लपक पड़े, लेकिन दोष उनका नहीं था, उस समय नगाड़ा ही ऐसा बजाया जा रहा था।

सब कुछ अच्छा जा रहा था कि, तेरे मन कछु और है, करता के कछु और, वाला मुहावरा चरितार्थ हो गया। अमरीका समेत पूरी दुनिया मंदी की चपेट में आ गयी। मंदी भी ऐसी कि परम्परागत नौकरियों के लाले पड़ गए, नए कोर्स वाली नौकरियों की बात कौन करे? अब अमरीका की अर्थव्यवस्था तो ऐसी है कि हर दशक में वहां एक बार मंदी आती है और कम आबादी वाला अमीर मुल्क होने के नाते अमरीका उससे बाखूबी निपटना जानता है। लेकिन अमरीका बनने चले हिन्दुस्तान के लिए यह नई विपत्ति थी, सो अनुभव भी नए–नए ही हुए। ओरिजिनल हिन्दुस्तान में व्हाइट कॉलर जॉब वाले पायलट, अमरीका बनने चले हिन्दुस्तान में कामगारों और मजदूरों की तरह हड़ताल करने लगे।

इसके साथ ही एक और मजेदार बात हुई। ऐसी हालात के लिए तब के हुक्मरान को कोसने वाले नए हुक्काम मसनद नशीन हुए और ऐसा होते ही उन्हें भी इल्हाम हुआ की अमरीका बनना ही उचित है, बस तरीके में थोड़ा फेरबदल ज़रूरी है। नतीजे में और जोर शोर के साथ वही सब होने लगा, जो पहले से हो रहा था। अब हाकिम –हुक्काम हैं, गलती किस से नहीं होती? अमरीका बनने की उतावली में यह भूल गए अमरीका कम आबादी वाला अमीर मुल्क है, जिसकी प्राथमिकतायें दूसरी हैं और हिन्दुस्तान की बिलकुल दूसरी। ऐसे में यही हो रहा है कि तरह – तरह कि डिग्री लोगों के पास है और जो भी रोज़गार हैं, उन्हें करने को युवा अभिशप्त हैं क्योंकि बैठे से बेगार भली। लेकिन इससे भी ज्यादा गलत ये हो रहा है कि युवाओं को यह कह कर बरगलाया जा रहा है कि फलाना नया कोर्स या नई ट्रेनिंग कीजिये, भविष्य बेहतर होगा, जबकि होगा कुछ नहीं ये बात हुक्काम करीने से जानते हैं।

Via बच्चों को शिक्षा कम फ़िक्स्ड डिपॉज़िट ज़्यादा दें

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