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इस दुर्दशा का अंत नहीं

अयोग्य शिक्षक बच्चों को खड़ी बोली हिन्दी में संस्कारित करने में सक्षम नहीं

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बोर्ड के एग्जाम शुरू हो चुके हैं। पहले ही दिन हिन्दी का पर्चा करीब दो लाख लड़के लड़कियों ने नहीं दिया। आजकल आकाशगामी बातों पर ज़ोर ज्यादा है सो ज़मीनी बातों पर लोग ज्यादा ध्यान नहीं देते। और फिर बात हिन्दी की हो तो ये मान लिया जाता है कि यह भाषा तो बनी ही दुर्दशा के लिए है और यह सोच कर बात भुला दी जाती है। लेकिन यह संकेत गम्भीर है और इशारा कर रहा है कि संकट बहुआयामी है। एक ओर तो यह शिक्षा के गिरते स्तर की ओर इशारा कर रहा है दूसरी ओर खड़ी बोली हिन्दी का जनाधार सिमट रहा है यह भी स्पष्ट हो रहा है।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा के तौर पर स्थापित किया जाए

देखा जाए तो जो हिन्दी हम बोलते हैं उसका इतिहास बहुत पुराना नहीं है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस हिन्दी को गढ़ना शुरू किया। कालांतर में स्वतंत्रता संग्राम के दौर में तय हुआ कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा के तौर पर स्थापित किया जाए। तब हिन्दी की बोलियों के ऊपर खड़ी बोली को तरजीह देकर उसे संस्कारित कर मानक हिन्दी का रूप दिया गया और उसे चलन में लाने का अभियान शुरू किया गया। अभियान सफल रहा और खड़ी बोली हिन्दी राष्ट्रभाषा के तौर पर लगभग स्वीकृत कर ली गई। हिन्दी फिल्मों ने भी इसे गति दी।

हिन्दी बनी पढ़े लिखे वर्ग की भाषा खड़ी बोली

अब कुल मिलाकर हिन्दी का स्वरूप ये बना कि पढ़े लिखे वर्ग की भाषा खड़ी बोली हिन्दी बनी लेकिन निचले स्तर पर अन्य बोलियों मसलन अवधी, भोजपुरी या बुन्देली में बातचीत की परम्परा चलती रही। दूसरी तरफ समय भी अपनी गति से चलता रहा। कालांतर में वो वर्ग भी शिक्षा लेने में आगे आए जो अभी तक इससे दूर थे। इसके बहुत से फलितार्थ सामने आए। ऐसे लोगों का खड़ी बोली हिन्दी से कोई लेना देना नहीं है, उनकी अपनी बोलियां ही उनके लिए अभिव्यक्ति का माध्यम हैं।

हिन्दी का पर्चा छोड़ना मुनासिब समझा

अब स्कूल और कॉलेज में बोलियां चलन में हैं और अयोग्य शिक्षक बच्चों को खड़ी बोली हिन्दी में संस्कारित करने में सक्षम नहीं हैं। अब ऐसे में ये तो होना ही था जो हुआ। बाकी विषय तो रट कर पास किए जा सकते हैं लेकिन भाषा नहीं। इसलिए बच्चों ने हिन्दी का पर्चा छोड़ देना ही मुनासिब समझा। अभी हालत और खराब ही होगी क्योंकि खड़ी बोली हिन्दी समझने और लिखने वाले मास्टर भी लगातार कम ही हो रहे हैं। ऐसे में बच्चों और हिन्दी का भविष्य क्या होगा यह सोचनीय विषय तो है ही।

देखा जाए तो यह स्थिति कोई एक दिन में नहीं बनी, शिक्षा के गिरते स्तर को लगातार नजरअंदाज किया गया। मातृ भाषा का जब ये हाल है तो बाकी विषय किस माध्यम से पढ़ाए जाएंगे और कैसे पढ़ाए जाएंगे? यही वजह है कि डिग्रीधारी अनपढ़ों की जमात दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। इससे भी ज्यादा दुःखद यह है कि गली गली खुल रहे अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों ही भगवान भरोसे है। बड़े होकर ये बच्चे क्या करेंगे सोच कर ही घबराहट होती है। लेकिन लगता नहीं कि व्यवस्था इस समस्या के प्रति गम्भीर है क्योंकि अगर गम्भीर होती तो यह नौबत ही नहीं आती।