The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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प्रभु दर्शन और निरीह कांस्टेबल की मौत

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एक ही दिन दो ख़बरों पर ध्यान गया, पहली 28 जुलाई को दस बड़े औद्योगिक घरानों के प्रभु, प्रदेश के लोगों को लखनऊ में दर्शन देकर कृतार्थ करेंगे। उन देव दुर्लभ क्षणों में यह बताया जाएगा कि सामान्य जन के कष्ट दूर करने के लिए कितने लाख करोड़ रुपयों का प्रसाद दिया जा चुका है और अब ये देवता गण कितने लाख करोड़ और रुपयों का प्रसाद भविष्य में देने के लिए भगवन शेषनाग की धरती लखनऊ पर अवतरित हुए हैं।
खबर में जनता को मिल चुके और मिलने वाले प्रसाद का विस्तृत वर्णन भी था जो भारी–भरकम आंकड़ों की वजह से मुझ अल्पज्ञ की समझ में नहीं आया, साथ ही पहले मिल चुके प्रसाद को खा कर अघाए लोग भी मुझे नहीं दीखते, दिखाई देते हैं तो बस तरह तरह की समस्याओं से घिरे दांत चियारे लोग।
बहरहाल, दूसरी खबर हृदय विदारक रही, पंकज बालियान नाम के एक युवा और सुदर्शन कांस्टेबल ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली, मरने से पहले उसने डीजीपी साहब को दरख्वास्त भी भेज दी कि अगर पुलिस महकमे में ड्यूटी सिस्टम सुधार दिया जाए तो बड़ी मेहरबानी। पुलिस अपने तरीके से केस को रफा–दफा करने में जुट गयी है, लेकिन मुझे लगता है वो संवेदनशील युवक जाते–जाते भी पुलिसिया रोग की सही नब्ज़ पकड़ गया।
साथ ही अल्प ज्ञानी होने के बावजूद मुझे पूरा भरोसा है कि पंकज की शिकायत का कोई संज्ञान नहीं लिया जायेगा। इसके बहुत से कारणों में से एक ये भी है कि इस समय पूरा पुलिस महकमा प्रभुओं की अगवानी में व्यस्त होगा, 28 जुलाई को प्रभु अवतरण में अब समय ही कितना बचा? साथ ही एक बात और बेरोजगारी के इस भयंकर दौर में आत्महत्या के खतरे के बावजूद कांस्टेबल बनने के लिए मारे–मारे फिर रहे पंकजों की कमी नहीं, सो इस तरह के फ़ालतू सुझावों पर ध्यान देने का तुक नहीं बनता।
मुझे याद है पिछले करीब दो दशक से देवताओं को भगवन् शेषनाग की धरती कुछ ज्यादा ही रास आने लगी है। सबसे पहले देवगण का आह्वान भाजपा के ही तत्कालीन भट्टारक रामप्रकाश गुप्ताजी ने किया था। पूजन–अर्चन समाप्त होने के बाद साधारण जन को बताया गया कि देवगण ने प्रसन्न होकर 400 कंपनियों का प्रसाद प्रदान किया है। इस सार्थक पूजन से प्रसन्न होकर तब से लेकर आज तक जितने भी भट्टारक उत्तर प्रदेश में गद्दीनशीन हुए सबने देवगण का आह्वान किया। एक बड़े और सफल अनुष्ठान के पुरोहित अमर सिंह भी रहे। दयालु देवगणों ने किसी भी अनुष्ठान में यजमान भट्टारक को निराश नहीं किया और प्रसाद में कंपनियों की बरसात कर दी।
देवगणों ने तो अपना काम कर दिया लेकिन बहुगुणी होने के बावजूद भट्टारक आखिरकार तो साधारण मानव ही ठहरे, सो देवगण से मिले प्रसाद की रक्षा वे नहीं कर पाए।
पंकज बालियान की आत्महत्या ऐसी ही एक कमी की ओर इशारा कर गयी। थके हुए निराश कांस्टेबल बच–बचा कर ही नौकरी करते हैं, ऐसे में एक सुरक्षित और मज़बूत पुलिसिया तंत्र के अभाव में देवगण आने के बाद वापस चले जाने में ही भलाई मानते हैं। दुनिया देख चुके देवगण जानते हैं कि शुरुआती आवभगत के बाद भट्टारक और उनके अयोग्य पार्षदों की दिखावटी विनम्रता और कपट मुस्कान देवगणों के किसी काम की नहीं।

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