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समझ में नहीं आतीं ये उलटबासियाँ

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आमतौर पर मैं उन विषयों पर नहीं लिखता जो विशेषज्ञता मांगते हैं, क्योंकि मैं सामान्य पढ़ा लिखा आदमी हूँ। लेकिन सामान्य आदमी की भी सहज जिज्ञासाएं होती हैं जो मेरे अन्दर भी हैं, तो सोचा ऐसी ही कुछ जिज्ञासाएं आपके साथ भी साझा की जाएँ। पिछले करीब दो दशक से देश की माली हालत ख़ासतौर से चर्चा का विषय होती है। इसमें कम से कम दो बातें साफ़-साफ़ समझ में आती हैं, एक तो साफ़ सुथरी अंग्रेज़ी में धीरे-धीरे बोलने वाले लोग बताते हैं कि माली हालात के नज़रिए से भारत अब दुनिया की ताकत बन चुका है और जल्दी ही पांच ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बनकर दुनिया की महाशक्तियों में से एक होगा। सुनकर अच्छा तो लगता ही है।

लेकिन क्या किया जाए जब हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं में चीखते चिल्लाते लोग नज़र आ ही जाते हैं जिनके लिए रोज़मर्रा की ज़िन्दगी दूभर हो चुकी है। इन चिल्लाते हुए लोगों के बारे में अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों का कहना है कि ये लोग अकुशल और आलसी हैं जो मिल रहे अवसरों का लाभ नहीं ले पा रहे और बिलावजह चिल्लाकर देश का माहौल खराब कर रहे हैं।

ऐसे में फिलहाल विशेषज्ञ ही बता सकते हैं कि सच क्या है? सामान्य व्यक्ति होने के नाते मेरे पास केवल अनुभव हैं जिन्हें मैं आपसे साझा कर रहा हूँ, नतीजा आप निकालें कि देश महाशक्ति है या सिर्फ बड़बोलापन। ख़ासा उम्रदराज़ आदमी हूँ इसलिए विशेषज्ञता न सही अनुभव तो मेरे पास है ही।

यह सच है कि अपने बचपन में जो समाज मैंने देखा वह भले बहुत अमीर नहीं था लेकिन सतत् चलायमान और स्थिर ज़रूर था। खेतों में दो बड़ी फसलें हुआ करती थीं और बीच के दो-तीन महीने किसानों के आराम के होते थे बावजूद इसके यह माना जा सकता है कि वे इतना तो पा ही जाते रहे होंगे कि आत्महत्या की नौबत न आये क्योंकि किसानों की आत्महत्याओं की ख़बरें तब नहीं सुनने में आया करती थीं, शहरों में भी जीवन मंथर गति से आराम से प्रवाहित था।

शिक्षा और रोज़गार सरकार के जिम्मे था और उस व्यवस्था में जिसको भी शिक्षा और रोज़गार चाहिए होता था कमोबेश मिल ही जाता था। अगर व्यक्ति पढ़ा-लिखा होता था और चाहता था तो सरकारी नौकरी भी उसे ज़रूर मिल जाती थी। आज के बड़बोलेपन की भाषा में कहें तो तब का निर्धन देश अपने नौकरों को पेंशन देकर बुढ़ापे की चिंताओं से मुक्त भी रखता था। व्यापारियों के रूप में भी ज्यादातर परचूनिए ही थे, बड़े उद्यमी भी चार–छह ही थे यहाँ तक कि टाटा–बिरला तो मुहावरा ही बन गए थे।

जीवन के हर क्षेत्र में सबसे बड़ी दाता सरकार थी और उसकी देखा-देखी बनियों की कोशिश भी होती थी कि उनकी छवि अच्छे रोज़गार देने वाले की बने। ऐसा जीवन आज की भाषा में कहें तो तब निर्धन भारत अपने नागरिकों को बड़े दिल से देता था। मुझे नहीं मालूम पांच ट्रिलियन की इकॉनमी वाले भारत में लोग क्या पाएंगे लेकिन जो आज दिख रहा है हैरतंगेज़ है, किसान आत्महत्या कर रहा है, नौकरियां हैं तो संविदा की, निजी क्षेत्र में औसत सैलरी छह से आठ हज़ार रुपये महीने है और उच्च शिक्षित मारे-मारे फिर रहे हैं, महाशक्ति भारत का यह विकास मेरे समझ में तो नहीं आता विशेषज्ञों की बात मैं नहीं जानता।