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संस्कृति स्कूल सुधार पायेगा कार्य संस्कृति ?

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आजकल अगर किसी ने कुछ किया है या बनाया है तो उसको गाली देने का चलन है। ये चलन हमेशा से रहा है लेकिन आजकल कुछ ज्यादा ही है। काम करने वाले इससे निरपेक्ष होकर अपना काम करते हैं और कुछ बनाने वाले लोग ही इतिहास में याद किये जाते हैं, सिर्फ गाली देने वालों को लोग जल्दी और निश्चित रूप से भूल जाते हैं। खैर बात शुरू करते हैं उस समय से जब अँगरेज़ हिंदुस्तान पर कब्ज़े के बाद यहाँ के शासन को व्यवस्थित करने में जुटे थे। उनकी अपनी प्राथमिकताएं थीं और तदनुसार वे संस्थाएं गढ़ रहे थे। आन्तरिक प्रशासन बनाए रखना और मालगुजारी इकठ्ठा करना एक बड़ा काम था, यह काम सफलतापूर्वक, सुचारू रूप से और निहायत ईमानदारी से हो सके इसके लिए तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस ने कलेक्टर नियुक्त किये। उस समय कलेक्टर को बड़ी तनख्वाह, बंगला, घोड़ा गाड़ी और नौकर-चाकर समेत जीवन की सारी सहूलियतें दी गईं।

इस व्यवस्था का ईस्ट इंडिया कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ने विरोध भी किया, जिस पर कार्नवालिस ने कहा कि ईमानदारी से काम हो इसके लिए ये सब सुविधाएं ज़रूरी हैं। कार्नवालिस का भरोसा खरा उतरा, तत्कालीन कलेक्टर अपने काम में इतने खरे उतरे कि उन्हीं को आधार बनाकर कालांतर में इंडियन सिविल सर्विस की स्थापना हुई जिसने लम्बे समय तक भारत में अंग्रेज़ी राज को कुशलता पूर्वक संभाले रखा। अँगरेज़ हुक्मरान ने भी सुनिश्चित किया आई. सी. एस. नियमानुसार पूरी योग्यता से काम करें। पूरे अंग्रेज़ी शासन के दौरान अफसरों के कार्यकलाप में हस्तक्षेप के न के बराबर ही उदाहरण मिलते हैं। हालांकि असीम ताकत से अफसरों में अहमन्यता भी आई लेकिन कुल मिलाकर उन्होंने प्रशासन सफलतापूर्वक चलाया।

शायद यही वजह रही कि स्वतंत्र भारत में भी आई.ए.एस. नाम देकर अफसरशाही के इस ढांचे को बरकरार रखा गया। अलावा इसके संविधान में इसको अलग से शक्ति देकर सुनिश्चित किया कि जनहित में यह नियमानुसार बगैर किसी दबाव में आये काम करें। लम्बे समय तक इस व्यवस्था ने काम किया भी, कई बड़ी योजनायें आई.ए.एस. अफसरों के अथक परिश्रम से आकार ले पाईं। लेकिन कालान्तर में राज्य पर नेता, अफसर और ठेकेदार या कहिये बनियों की तिकड़ी हावी हो गयी। अब कलेक्टर, कलेक्टर नहीं रहा किसी न किसी कॉकस का हिस्सा हो गया जिसकी अपनी प्रतिबद्धताएं हैं, जनसरोकार उसकी प्रतिबद्धता नहीं रहा, यहीं से उसकी गरिमा जाती रही और नेता लोग उससे तू – तड़ाक की भाषा में बात करने लगे। अब कलेक्टर सम्मानित प्राणी नहीं रहा, वह नेताओं द्वारा इस्तेमाल होने की चीज़ बन कर रह गया।

जब कोई किसी को इस्तेमाल करता है तो अपमानित करने के साथ ही पुरस्कृत भी करता है। पिछली समाजवादी सरकार में अफसरों के बच्चों को संस्कृति स्कूल से नवाज़ा गया। 60 करोड़ की लागत से बने इस स्कूल में अघोषित तौर पर अफसरों के ही बच्चे पढ़ रहे हैं इसलिए सरकार से 40 करोड़ और रुपये इस स्कूल को बेहतर करने के लिए मांगे गए हैं। माना जा रहा है कि स्कूल से निकल कर बच्चा कलेक्टर या समकक्ष कोई बड़ा अफसर ही बनेगा। बच्चों को शुभकामनाएं लेकिन अगर ये अपने पिताओं की तरह ही अयोग्य, भ्रष्ट और रीढ़हीन बने तो फिर संस्कृति स्कूल से क्या लाभ, ऐसे तो वे सामान्य स्कूल से ही बन जाते।