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सतरंगे मास्टरों की बदरंगी दास्तान

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हम लोगों के बचपने में शिक्षा व्यवस्था बहुत सपाट सी हुआ करती थी मिडिल, इन्टर और यूनिवर्सिटी की पढ़ाई होती थी जिनको मास्टर, प्रवक्ता और प्रोफेसर साहब पढ़ाया करते थे। मास्टर बहुत ही आदरसूचक शब्द होता था जिसका मतलब हुआ मालिक यानी बच्चे को मालिक के हाथों सौंप माँ-बाप निश्चिन्त हो जाते थे और अधिकाँश मास्टर भी इस विश्वास पर खरे उतरते थे। हालांकि बाद के दिनों में शिक्षक को मास्टर कह उसका उपहास करना चलन में आया जो आज भी जारी है। बहुत पुरानी ये व्यवस्था कम से कम मेरे युवा होने तक तो चली ही। उसके बाद से मास्टर सादे से सतरंगी होने लगे।

शिक्षामित्र, मास्टर, अंशकालिक मास्टर, अतिथि प्रवक्ता और बिना सरकारी मदद के खोले गए वित्त विहीन संस्थानों में मास्टरों की कई नई प्रजातियाँ सामने आईं, इनमें बिना पैसे पढ़ाने वाले हैं तो थोड़े बहुत पैसे लेकर पढ़ाने वाले भी मिल जायेंगे। इतने सतरंगी मास्टर होने के बावजूद एक सर्वे के मुताबिक़ अपने यहाँ प्राइमरी का बच्चा कक्षा दो के बच्चे के बराबर भी ज्ञान नहीं रखता और उच्च शिक्षा स्तर पर मात्र साक्षर स्नातकों की फ़ौज हमारे पास है जो काम-काज और तकनीक के लिहाज़ से शून्य है, यानी किसी काम की नहीं है।

इस बात को लेकर आजकल काफी हो-हल्ला मचाया जाता है लेकिन अगर गौर से अखबार पढ़िए तो आसानी से समझ जायेंगे कि ऐसा है क्यों? आये दिन इन सतरंगी मास्टरों में से कोई एक रंग लखनऊ की सड़कों पर जिंदाबाद–मुर्दाबाद का नारा लगाते पड़ा रहता है। उनकी मांगें अनंत हैं, इनमें कम वेतन, नियुक्तियों में कदाचरण, इम्तहानों में नक़ल और स्थाईकरण समेत अनगिनत मांगें शामिल हैं। इस स्थिति का एक मतलब यह भी हुआ कि ऐसी नौकरी में जब कोई व्यक्ति आ रहा है, जहां उसे मालूम है कि धन है न स्थायित्व, तो ज्यादा आशंका इस बात की है कि वह व्यक्ति खुद भी दोयम दर्जे का ही होगा तो फिर वह अव्वल दर्जे के विद्यार्थी कैसे तैयार कर सकता है?

मास्टरों की इस दुर्दशा के लिए सिर्फ और सिर्फ सरकार ज़िम्मेदार है। आम धारणा है कि सरकारी मास्टर वेतन काफी पाते हैं और काम कुछ नहीं करते और अज्ञानी तो वे हैं ही। यह बात काफी हद तक सही भी है लेकिन इस शोर के नीचे मास्टरों की वे तमाम प्रजातियाँ छिप जाती हैं, जिनका निर्माण सरकार ने ही किया और सेवा शर्तें खराब होने की वजह से वे आये दिन सड़कों पर पड़ी रहती हैं। ऐसे में ये दोयम दर्जे के मास्टर क्या खाक पढ़ाते होंगे कोई भी समझ सकता है। दरअसल ये पूरी बदहाल शिक्षा व्यवस्था सरकार की देन है।

आज से करीब तीन दशक पहले जब शिक्षा के विस्तार की ज़रूरत महसूस हुई तो सरकार ने जान-बूझकर दोतरफा खेल खेला, सम्पन्न तबके के लिए निजी क्षेत्र को दावत दी और विपन्न तबके के लिए वित्त विहीन टाइप के संस्थानों को मान्यता दे दी गई। ये पूरी व्यवस्था तात्कालिक रूप से बिना उचित नियमन, काम चलाऊ रूप में जनता को मूर्ख बनाने के लिए कर दी गई, जिसमें गुणवत्ता निर्धारण की कोई व्यवस्था नहीं है। इनकी देखा-देखी पहले की काम करने वाली व्यवस्था भी पूरी तरह ढह गयी। नतीजे में चाहे निजी हो या सरकारी संस्थान, आज की तारीख में मात्र साक्षर स्नातक ही उत्पन्न हो रहे हैं, संविदा की नौकरियां जिनकी नियति है।