The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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सिर्फ कोसें नहीं कुछ करें भी हुज़ूर

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बात बहुत छोटी सी है और बहुत बड़ी भी, हालांकि छापने वाले पेपर ने इसे छोटी ही समझा। खैर कोई बात नहीं अपना अपना नज़रिया। गाजीपुर के कप्तान हैं डॉ यशवीर सिंह, उन्होंने अपनी दो साल की बिटिया अम्बावीर का दाखिला स्थानीय आंगनबाड़ी केन्द्र में कराया है। जिले के कप्तान हैं तो ज़ाहिर सी बात है पढ़े लिखे विवेकशील प्राणी होंगे, तभी उनकी समझ में आया होगा कि उनकी इकलौती दुलारी बिटिया को साथियों की ज़रुरत है, वर्ना एकलौता बच्चा गुमसुम सा रहने लगता है। मुझे पता तो नहीं लेकिन उम्मीद करता हूँ उन्होंने आसपास की ऐसी संभावित जगहों पर ज़रूर नज़र डाली होगी जहाँ उनकी बिटिया को खिलंदड़ा माहौल मिले।

बहुत कुछ देखने समझने के बाद कप्तान साहब ने स्थानीय आंगनबाड़ी केन्द्र को इस काम के लिए उचित जगह समझा होगा। बच्चों की बेहतर परवरिश के लिए ही सरकार ने ये केन्द्र बनाए हैं, उस केन्द्र में भी सारी सुविधाएँ होंगी, जहां कप्तान साहब की बिटिया को दाखिला मिला है और वहां पर जो लापरवाहियां होंगी भी वे कम से कम अम्बावीर के वहां रहने तक तो नहीं ही होंगी। एक बात और जिस पर आजकल के माहौल की वजह से कम ही ध्यान जाता है वो यह कि कप्तान साहब की जो तनख्वाह होगी उसमे वो बहुत महंगे क्रेच को अफोर्ड भी नहीं कर सकते और ऐसा क्रेच शायद गाजीपुर में हो भी नहीं। इसलिए सरकारी अफसर होने के नाते व्यावहारिकता का भी तकाजा था कि वे अपनी बिटिया को स्थानीय आंगनबाड़ी केन्द्र में दाखिल कराते और वही काम उन्होंने किया जिसका फायदा उनकी बिटिया और केन्द्र दोनों को होगा।

अब याद तो नहीं कि कब लेकिन कुछ ही समय पहले किसी छोटे शहर के डीएम ने अपनी पत्नी का प्रसव सरकारी अस्पताल में कराया था, जहाँ उन्हें पूरी सुविधा मिली और सरकारी कर्मी होने के नाते फीस में शायद कुछ रियायत भी मिली हो। इन दोनों ही अफसरों ने भी सरकारी संस्थाओं में होने वाली लापरवाहिओं के बारे में सुना होगा लेकिन बड़े अफसर होने के नाते ये वहां मिलने वाली सुविधाओं के बारे में भी जानते होंगे इसीलिये उन्होंने वहीं जाना मुनासिब समझा। अब यहीं पर थोड़ा ठहर कर सोचिये सरकारी संस्थाएं हर जगह हैं जो सारी सुविधाओं से भरपूर हैं लेकिन सम्पन्न तबके ने या तो उनकी उपेक्षा की है या उन्हें कमाने खाने का साधन बना लिया है।

ऐसे में किसी भी तरह की निगरानी से विहीन ये संस्थाएं लापरवाही और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गईं हैं, दूसरी तरफ उन्हीं सेवाओं को देने के लिए प्राइवेट सेक्टर की संस्थाएं कई गुना ज्यादा कीमत वसूल रही हैं बावजूद इसके सफल सेवा और संतुष्टि की कोई गारंटी नहीं इसे हम आप अपने रोज़मर्रा के अनुभव से जानते भी हैं, ज्यादा लिखने की ज़रूरत नहीं। अब इसी जगह रुक कर एक चीज़ ठन्डे दिमाग से सोचें अपने देश में प्राइवेट सेक्टर बेकार है लेकिन सरकारी संस्थाओं में अभी भी जान बाकी है सारे कोसने के बावजूद अभी भी वहां योग्य लोग हैं, इन संस्थाओं को कोस कोस कर इनकी उपेक्षा मत करिए। इनको इस्तेमाल करिए इनकी निगरानी करिए और इनके साथ सहयोग कीजिये वर्ना आप निजी क्षेत्र के रहमो करम पर होंगे जो आपसे ले सब कुछ लेगा बदले में देगा कुछ नहीं।

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