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सुनहु तात, अब पौध कहानी

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सयाने लोग बताते हैं रईसी तीन पुश्त में आती है और जब जाती है तो भी जाते–जाते तीन पुश्त गुज़ार कर ही जाती है। मीडिया पर भी यह बात खरी उतरती है, देसी भाषाओं के मुकाबले अंग्रेज़ी प्रेस अभी भी गुणवत्ता के लिहाज़ से कहीं ज्यादा आगे है, हालांकि पहले की तुलना में अंग्रेज़ी प्रेस में भी गिरावट तो आई ही है। अंग्रेज़ी मीडिया अभी भी अपनी विषय वस्तु को लेकर आग्रही है और इसे पढ़ने के बाद पाठक देश–दुनिया के बारे में कहीं ज्यादा जागरूक होता है।

पिछले कई दिन मुम्बई में गुज़रे, जहां रुका था वहाँ अंग्रेज़ी अखबार ही आते थे, उन्हें पढ़ने के बाद पता चला कि इस समय पूरे देश में सरकारें पौधे लगाने पर उतारू हैं, अपने यहाँ लखनऊ के हिन्दी अखबारों को पढ़ कर लगता था कि केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का विवेक जगा है और वे सूबे की धरा को शस्य श्यामला करने पर उतारू हैं, हिन्दी मीडिया में ख़बरें दी ही चारण भाव से जाती हैं, ये रोग काफी पुराना है।

इस प्रवृत्ति के अपवाद भी हैं लेकिन न के बराबर। बहरहाल बात हो रही है पौधे लगाने की, तो पौधे भी राष्ट्रीय चरित्र बता सकते हैं ये बात महाराष्ट्र जाने पर समझ में आई। उत्तर प्रदेश यानी एक विपन्न राज्य और महाराष्ट्र यानी एक संपन्न राज्य, अगर पौधे लगाने के नाम पर दोनों जगह एक ही खेल हो रहा है तो मानने में कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि ये हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गया है।

महाराष्ट्र में पिछले साल 30 करोड़ पौधे सरकार ने लगाए और इस साल 33 करोड़ पौधे लगाने के बाद ही वहां की सरकार विश्राम करेगी। सरकार है जो भी करेगी बड़ा ही करेगी यानी मोटे तौर पर अगर इन दोनों सालों के पौधों को ही गिने तो भविष्य में महाराष्ट्र में हर नागरिक को सुस्ताने के लिए 10 वृक्षों की छाया नसीब होगी। थोड़े–बहुत पुराने पेड़ भी होंगे, इधर जो 63 करोड़ पौधे लगे हैं, सरकार के महती प्रयास के बाद भी उनमें से कुछ सूखेंगे ही, इसलिए तार्किक रूप से भी प्रति व्यक्ति 10 वृक्षों की संख्या को अतिश्योक्ति न मानें।

लेकिन अपना उत्तर प्रदेश इतना भाग्यशाली नहीं। हालांकि कर्मठ वन विभाग सूबे की धरा को हरा–भरा बनाने में हमेशा जुटा रहता है तो भी पिछले मुख्यमंत्री ने विशेष अभियानों के तहत करीब 50 करोड़ पौधे लगाए। फिलहाल के अपने यशस्वी मुख्यमंत्री भी एक अभियान के तहत 22 करोड़ पौधे लगा चुके हैं। आधा कार्यकाल बीत चुका तो भी यह मानने में कोई हर्ज़ नहीं कि वे अभी 22 करोड़ पौधों का एक अभियान तो और चलाएंगे ही। सूबे के हित में हम–आपको इसकी शुभेच्छा भी करनी चाहिए।

अब अगर महाराष्ट्र की तर्ज़ पर गिनती करें तो भविष्य में उत्तर प्रदेश में भी प्रति व्यक्ति पांच वृक्षों की छाया यहाँ के लोगों को नसीब होगी। देखा जाए तो कितनी बड़ी बात है आमजन वृक्षों की छाया तले सुस्ता सकें इसके लिए विशिष्ट जन कड़ी धूप में खड़े होकर पौधे लगा रहे हैं। प्रति पौधा दस रुपये भी लागत माने तो सरकारें जनकल्याण के लिए कितना रुपया खर्च कर रही हैं आम जन को नए लगे पौधों के साथ ये सब भी नहीं दिख रहा। धीरज रखें उन्हें वृक्ष तो बनने दें तब दिखेंगे।