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भीष्म पितामह

महाभारत से जुड़ी इस गर्वोक्ति को मैंने करीब 30 साल पहले, पहली बार सुना था। पढ़ लिख कर बेरोजगार था तब भी पढ़ने-लिखने में ही फ़ालतू समय बिताता था, उसी समय एक सज्जन ने चर्चा के दौरान इस गर्वोक्ति का ज़िक्र किया। बड़ा कौतूहल हुआ कि क्या ऐसी सार्वकालिक प्रासंगिक किताब हो भी सकती है? फिर सोचा कि सनातन धर्म के…
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