The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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वह मार्मिक दृश्य जिसे मैं भुला नहीं पाता

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इस वाकये को गुज़रे अंदाज़न साल भर से ज्यादा तो हो ही चुके होंगे लेकिन आज भी यह जस का तस मुझे याद है। देसी कुत्ते–कुतिया हर जगह बहुतायत से मिलते हैं, जहां मैं रहता हूँ वहां भी काफी हैं। कुछ तीन–चार साल तक दिखाई देते हैं, ज्यादातर जन्म लेने के चार से छह माह के अन्दर ही दुनिया छोड़ जाते हैं, भूख, उपेक्षा, बीमारी और दुर्घटनाएं इसकी वजह होती हैं। हर साल क्रूर प्रकृति यह दृश्य दोहराती है, लेकिन इस परिदृश्य को बदलने के लिए चाह कर भी कुछ नहीं किया जा सकता सिवाय इसके कि सामर्थ्य भर दो-चार कुत्तों को खिला-पिला कर उन्हें थोड़ा बेहतर जीवन दे दिया जाए। ऐसा बहुत से लोग करते हैं, मै भी उनमें से एक हूँ।

वो भी एक चितकबरी सी देसी कुतिया थी, जिसने मेरे घर के बगल के उजाड़ खेतों में पिल्ले दिए और उन्हें दूध पिलाने के बाद सामने की मिठाई की दूकान में बैठी रहती थी, जहां उसे जीवित रहने भर को जूठन मिल जाती थी। मैंने भी उसे दो पैकेट बिस्कुट प्रतिदिन देने शुरू किये, जिससे न सिर्फ उसका पेट भरने लगा वरन शरीर भी पुष्ट होने लगा। अब कुतिया मेरी दोस्त बन गयी और मुझे देखते ही खिलंदड़े अंदाज़ में मेरे पास आ जाती थी, कभी-कभी जब मैं उस से पीछा छुड़ाने के लिए उसको मारूं तो लोट कर मानो कहती थी मुझे मारो मत मेरे साथ खेलो। ऐसे ही दिन गुज़र रहे थे मैं सबेरे या शाम जब भी टाइम मिले उसको बिस्कुट खिला कर और उसके साथ खेल कर आगे बढ़ जाता था।

मेरी देखा देखी मुहल्ले के लड़कों ने भी उसे खिलाना और उसके साथ खिलवाड़ करना शुरू कर दिया अब वह आवारा नहीं वरन बहुतों की चहेती और दुलारी कुतिया थी। तभी एक दिन सबेरे जब मैं बाहर आया तो देखा पिल्ले सामने मिठाई की दूकान पर थे और कुतिया थोड़ा घायल अवस्था में सामने सड़क पर बैठी थी। दूकान मालिक के लड़के दीपक ने बताया कि सबेरे पाँच-छह बजे के लगभग कहीं से एक पागल कुत्ता आया और पिल्लों पर झपट पड़ा, कुतिया भी पिल्लों को बचाने के लिए उग्र होकर पागल कुत्ते पर झपटी। उसी लड़ाई में कुतिया घायल हो गयी और पागलपन उस पर असर करने लगा है। दीपक ने उस पागल कुत्ते को खदेड़ा और पिल्लों को दूकान में ले आया ताकि पागल कुत्ता लौट कर उन्हें नुक्सान न पहुंचा सके।

दीपक ने मुझे हिदायत दी कि मैं भी कुतिया के पास न जाऊं क्योंकि पागलपन के असर में वह दो-तीन लोगों को दौड़ा चुकी है। बहरहाल मैं बिस्कुट लेकर कुतिया के पास पहुंचा। वह हल्का सा गुर्राई फिर पथरीली आँखों से मुझे पहचान कर चुप हो गयी। पागलपन असर कर चुका था, वह खाली आखों से मुझे देख रही थी, बिस्कुट भी उसने नहीं खाया, मेरे सिर सहलाने पर भी चुपचाप बैठी रही। एकाएक अपनी पूरी ताकत बटोर कर उठी, लड़खड़ाती हुई पिल्लों तक गयी और उन्हें दूध पिलाने लगी। करीब दस मिनट दूध पिलाया होगा इतने में वह एकदम बेदम हो गई, बुरी तरह से फिर डगमगाते हुए खेतों की तरफ गयी और गिर कर मर गयी। माँ भी तो थी, बच्चों के प्रति कर्त्तव्य निभा कर गयी।

3 Comments
  1. Pranjali thakur says

    बहुत मार्मिक मेरे भी colony में ऐसे बहुत सरे दोस्त हैं मैं इसको पढ़ ही नहीं महसूस भी कर रही हू

  2. sanjay srivastava says

    आपकी किस्सागोई कमाल की है .सबसे बड़ी बात यह कि इसतरह की सामग्री अब दुर्लभ हो गई hai. बेहतरीन शुरुआत .ऑडियो फ़ाइल भी साथ दें अच्छा rahegaa. यह काम मुश्किल नहीं है .इससे उपयोगिता बहुत बढ़ेगी .

  3. आलोक says

    अच्छा प्रयास है। शुभकामनाएं

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