- Advertisement -

- Advertisement -

उद्यमी नहीं, बिचौलिए या दलाल कहें

0 2,929

छह महीने की अवधि में नेशनल थर्मल पॉवर कार्पोरेशन उत्तर प्रदेश को करीब दो हजार मेगावाट बिजली और देगा। यह बिजली टांडा और मेजा की यूनिट की बढ़ी क्षमता की वजह से मिलेगी। यह कोई बड़ी खबर नहीं है।

थर्मल पॉवर कार्पोरेशन का यही काम ही है। लेकिन आजकल के माहौल में यही खबर बड़ी बन जाती है अगर स्मृति पर थोड़ा जोर डालें। करीब दो दशक हुए होंगे जब ये तय पाया गया कि सब काम सरकारें ही नहीं करेंगी कुछ काम उद्यमी भी करेंगे जैसे अमेरिका और यूरोप में करते हैं।

जब तय ही हो गया तो फिर ये काम होने भी लगा। देश भर में कई क्षेत्रों में उद्यमी सक्रिय हो गए लेकिन फिलहाल बात उत्तर प्रदेश की। उत्तर प्रदेश बड़ा राज्य है आबादी भी ज्यादा है सो यह तय पाया गया कि भविष्य में यहां की बिजली की ज़रूरत सरकारी कम्पनियां शायद पूरी नहीं कर पाएं। इसलिए निजी क्षेत्र को भी इसमें शामिल करना चाहिए।

उत्तर प्रदेश में उस समय सपा और बसपा की सरकारों का दौर था, उनके दरबार में उद्यमी हाज़िर हुए और कहा हुजूर कम दाम पर ज़मीन और दीगर रियायतें मुहैय्या कर दी जाएं तो सूबे में बिजली की बहार ला देंगे।

उनकी बात पर भरोसा नहीं करने की कोई वजह भी नहीं थी और सूबे को बिजली की जरूरत भी थी। इसलिए बड़ी संख्या में उद्यमियों को ज़मीन समेत दूसरी सुविधाएं दे दी गईं और यह अपेक्षा की गई की एक निश्चित अवधि में ये लोग बिजली उत्पादन शुरू कर देंगे। मुझे याद है उस समय लगभग रोज़ ही किसी ना किसी निजी क्षेत्र की कंपनी के साथ बिजली उत्पादन के करार की खबरें आती थीं। उस समय के एक बड़े नेता और उनसे भी बड़े एक अफसर की इसमें मुख्य भूमिका होती थी।

समानांतर रूप से सरकारी कंपनियों ने भी बिजली उत्पादन में अपनी क्षमता बढ़ानी शुरू की क्योंकि यही उनका काम था। हालांकि उस समय जो हल्ला था उसके मुताबिक इन कंपनियों की क्षमता को शक की निगाह से देखा जाने लगा था।

बहरहाल समय अपनी गति से चलता रहा। अक्षम सरकारी कंपनियों में बिजली उत्पादन बढ़ने लगा और अपनी काबिलियत का दमामा बजा कर आईं निजी कंपनियां क्या कर रही हैं यह जानने में अब कोई दिलचस्पी नहीं लेता क्योंकि जो खेल होना था हो चुका।

नेता और अफसर को उनका हिस्सा मिल चुका और उद्यमी थोड़ी बहुत बिजली बना कर सूबे में अरबों रुपयों की जमीनों के मालिक बन गए। सायास बदनाम की गई सरकारी कंपनियों ने स्थति बिगड़ने नहीं दी इसलिए भी उद्यमियों के कारनामों पर पर्दा पड़ गया।

हां, यह जरूर है कि उस हल्ले में सरकारों से जमीन और दूसरी सुविधाएं लेकर उन्होंने एक बार फिर यह साबित किया कि वे योग्य बिचौलिए तो हैं ही। और अब अंत में ये किस्सा भी सुन ही लीजिए अमेरिका या यूरोप में जब कोई उद्यमी बिजली बनाने की यूनिट लगाता है तो सरकार उसे सिर्फ परमिट देती है कि इतने मेगावाट बिजली बनाने की यूनिट वो लगाए।

उद्यमी अपने संसाधनों से यूनिट लगाता है और उसमें से तयशुदा बिजली सरकार को कम दाम पर वंचित तबके के लिए देता है। बची बिजली वह मार्केट प्राइस पर बेचने को स्वतंत्र होता है। ये है अमेरिकन और यूरोप का पूंजीवाद, लेकिन अपने देश की सरकारें और बिचौलिए ऐसा असली पूंजीवाद पसंद नहीं करते। उन्हें बीच की दलाली वाला पूंजीवाद का भारतीय संस्करण ज्यादा पसंद है।