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फिर-फिर मुठभेड़ करेगी यह उन्मत्त भीड़

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हार्दिक पटेल आज की तारीख में एक बिसरा हुआ नाम है। ज्यादा आशंका है कि हुक्मरान-ए-दौरां इस नाम को हमेशा के लिए दफन करने की पूरी कोशिश करेंगे। वे सफल हो या न हों, लेकिन जो मुद्दे हार्दिक पटेल ने उठाए हैं, वे प्रथम दृष्ट्या बेढंगे दिखने के बावजूद पूरी शिद्दत और तार्किकता के साथ शासक वर्ग के सामने फिर-फिर मुठभेड़ करने के लिए उठ खड़े होंगे। इतिहास गवाह है गुजरात में ही चिमन भाई पटेल के मुख्यमंत्रित्व काल में छात्रों के स्वतः स्फूर्त आंदोलन को तत्कालीन सरकार ने भले ही दबा दिया हो, लेकिन उसकी तार्किक परिणति इमरजेंसी और फिर इन्दिरा गांधी की बेदखली के रूप में सामने आयी। और भी कई उदाहरण हैं। उस समय प्रभुवर्ग ने गुजरात के छात्रों को दिग्भ्रमित बताया और भी तमाम लांछन लगाये गये। जैसा आज भी हो रहा है।

कहा जा रहा है कि आंदोलन को कांग्रेस की फण्डिंग है और भी कई कारण गिनाये जा रहे हैं। हो सकता है कि यह सब कारक हार्दिक पटेल के आंदोलन में सक्रिय हों, लेकिन तब भी ऐसे स्वतः स्फूर्त आंदोलन में उमड़ी जनता की अपनी शिकायतें होती हैं, जो कई बार पूरी तरह से स्पष्ट और परिभाषित भी नहीं होतीं, लेकिन जनता अपनी उन उलझी शिकायतों का तत्कालिक समाधान चाहती है। इस आंदोलन को मोटे तौर पर समझने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा। फर्ज कीजिए-तीन दोस्त है। एक आईएएस बन जाता है, दूसरा बड़ा काश्तकार है, वह अपनी खेती संभालता है, और तीसरा बड़े व्यापारी का बेटा है, सो अपना पुश्तैनी कारोबार संभालता है। जीवन की संध्या बेला में ज्यादा सम्भावना है कि सबसे ऐश्वर्यशाली और स्थिर जीवन आईएएस ने ही जिया होगा। बड़े काश्तकार के सामने जीवन भर कृषि जन्य समस्याएं मुंह बाये रही होंगी। कई बार प्रकृति की बेरुखी से अपनी बर्बाद फसल को देखकर उसने अफसोस किया होगा। यही हाल बड़े व्यापारी का भी हुआ होगा। ऐश्वर्यशाली जीवन जीने के बावजूद जीवन भर उसने व्यापारिक जगत की उठा-पटक का दंष झेला होगा। और उससे उत्पन्न अस्थिरता उसकी मन स्थिति को निरन्तर विचलित करती रही होगी।

लाख मनमोहक प्रयासों, विकास के नारों और भूमण्डलीकरण के शोर के बावजूद अभी भी भारतीय समाज में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ है। खेती पुश्तैनी धंधा है उसी तरह व्यापार। खेती में लगी जातियां परम्परागत हैं और उसी तरह व्यापारी और व्यवसायी घराने भी। हां एक बहुत बड़ा फर्क हुआ है, और इस फर्क ने 1991 में मनमोहन सिंह के आने के पहले तक आकार ले लिया था। आरक्षण के चलते पिछड़ों और दलितों के एक तबके ने सरकारी नौकरियों की सम्पन्नता और स्थिरता का स्वाद ले लिया था। 1991 से मनमोहक नीतियां लागू होने के बाद और आज तक उसके नैरन्तर्य के बावजूद एक बहुत छोटे तबके को छोड़ दिया जाये तो नये स्थिर और सम्पन्न तबकों का निर्माण नहीं हुआ है। खेती नष्ट हो चुकी है, किसान आत्म हत्यायें कर रहे हैं और व्यवसायी अस्थिर व्यापारिक माहौल में सरकार की नई-नई नीतियों में स्थिरता खोजने में जुटे हैं।

मनमोहक नीतियों के कई परिणाम जो ज्यादा चर्चा में नहीं आये, खासे भयावह रहे। किसानों की आत्महत्याएं तो लोग देख ही रहे हैं, लेकिन शेयर बाजार की उठा-पटक में बर्बाद लाखों लोगों का अवसाद ग्रस्त जीवन और कई बार मृत्यु तक लोगों का उतना ध्यान नहीं गया। तमाम नई डिग्रियां जिनके बारे में दावा था, वे नये आर्थिक माहौल में छात्रों के लिए सुनहरे जीवन का दरवाजा है, उनके लिए मृगतृष्णा साबित हुई। राज्य दर राज्य बीटेक पास लाखों बेरोजगारों की भीड़, इसका एक उदाहरण है। कुल मिलाकर यह कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि मनमोहक नीतियों से सम्पन्नता आयी तो जरूर लेकिन वह स्थाई नहीं बल्कि अस्थिर सम्पन्नता है। पिछली मंदी में जिसका लोगों ने भयावह अनुभव भी किया है। रातों रात लोग राजा से रंक बन गये। एक झटके में नौकरियां गवाकर मजदूरों की तरह जिन्दाबाद-मुर्दाबाद का नारा लगाने वाले पायलटों का नजारा लोगों की स्मृति में ताजा होगा।

इस सारी उथल-पुथल के दौर में अगर कोई वर्ग लगातार सम्पन्न और स्थित जीवन बिता रहा है, तो वह सरकारी नौकर है और लगातार बढ़ रही आबादी के मद्देनजर सरकारी नौकरियों की संख्या अपेक्षाकृत अनुपात में कम होती जा रही है। ऐसे में आरक्षण ही लोगों को एक मात्र विकल्प नजर आ रहा है, जो अर्थव्यवस्था रूपी रेगिस्तान के नखलिस्तान में पहुंचने का एक मात्र साधन है, खास तौर से उन वर्गों के लिए जो परम्परागत रूप से सरकारी नौकरियां कैसे हासिल हों, इस प्रक्रिया से वाकिफ नहीं हैं। शायद यह कारण हो सकता है, जो लोगों का हुजूम हार्दिक पटेल के पीछे लामबन्द हो गया। अगर ऐसा है तो तय जानिए हुक्मरान हार्दिक पटेल को तो खत्म कर सकते हैं, लेकिन ये मुद्दे दिन पर दिन विकराल होकर सत्ताधीषों का जीना हराम कर देंगे।