The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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इस्तीफा – उर्जित पटेल का, स्वेच्छा या मजबूरी?

क्या उर्जित पटेल भारत के आम आदमी की लड़ाई रिज़र्व बैंक के अन्दर लड़ रहे थे जिससे वित्त मंत्रालय सकते में था?

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यह महज़ एक इत्तेफाक नहीं है कि एक तरफ तो उर्जित पटेल के इस्तीफे और साथ ही दूसरी ओर तीन बड़े राज्यों में जनता द्वारा भी वृहद संख्या में भाजपा के खिलाफ मतदान दोनों घटनाओं ने केन्द्र में बैठी मोदी सरकार को यह संकेत दिया है कि जनता की आशाओं यथा विकास, कम महंगाई इत्यादि जब सरकार के अजेंडा से हट जाते हैं तो जन साधारण इसे बहुत दिन तक बर्दाश्त नहीं करता।

यह तो तय है कि मोदी सरकार की विकास को प्रमुख स्थान न देने की गलती को न मानने की हठधर्मिता के चलते ही उर्जित पटेल हों या उनके पूर्ववर्ती रघु राम राजन, किसी की बात सुनने की भी ज़हमत नहीं की। जबकि ये दोनों ही महंगाई न बढ़ने के लिए ही मोदी सरकार से लड़ रहे थे। चुनाव के नतीजे आने के बहुत पहले से उर्जित पटेल इस मुद्दे पर सरकार को समझाने की कोशिश में लगे थे पर अहंकार में डूबा वित्त मंत्रालय पटेल को सिर्फ एक नौकर समझता रहा। रिज़र्व बैंक को देश के हित में स्वायत्तता से काम करने का अधिकार है और उसकी हैसियत वित्तमंत्री से कम नहीं है, इस तथ्य को समझने के बजाए सेक्शन 7 का प्रयोग करने जैसी दम्भपूर्ण बातें वित्तमंत्री ने कीं। नतीजा था रुपए की कीमत में डॉलर के मुकाबले गिरावट और गरीब जनता ही नहीं मध्य वर्ग तक पर महंगाई का बोझ। सो उर्जित पटेल ने तो शांति से इस्तीफ़ा दे दिया पर महंगाई के बोझ तले पिसी जा रही जनता ने तीन राज्यों में सत्तारूढ़ दल को बाहर का रास्ता दिखा कर साफ़ कर दिया है कि पटेल जनता की ही लड़ाई रिज़र्व बैंक के अन्दर लड़ रहे थे।

आरबीआई एक ऐसी संस्था है जिसका काम ही देश के आर्थिक घोड़े को लगाम लगाना है कि जिससे वह गलत राह पर और वो भी तेज़ी से न चल पड़े। पर केन्द्र सरकार तो बिगड़ैल घोड़े की तरह लगाम के हिसाब से चलना ही नहीं चाहती थी तो फिर ऐसे बिगड़ैल घोड़े से उर्जित पटेल अकेले कैसे काबू पाते? अब भी इस बिगड़ैल ने उर्जित पटेल जैसे सवार को गिरा कर अब शक्तिकान्त दास को शायद यह सोच कर लगाम सौंपी है कि अल्प अनुभवी यह सवार उसे मनमानी राह पर दौड़ने देगा। शक्तिकान्त जी को सिर्फ वित्त मंत्रालय में बजट से सम्बंधित कार्यों का अनुभव है साथ ही रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीतियों के बारे में इनका कोई ख़ास अनुभव है नहीं। शायद सरकार का मानना है कि जब तक इन्हें कुछ समझ आयेगा तब तक वे अपना खाली हो चुका खज़ाना आरबीआई के संचित और आरक्षित धन में सेंध लगा कर भर लेंगे। पर सयाने वित्तमंत्री दो बातों पर ध्यान देना ही नहीं चाहते। एक तो यह कि जनता को 2019 में अपनी ताकत का प्रयोग करना बाकी है। दूसरे यह कि अगर आरबीआई वित्त मंत्री को बताना चाहते हैं कि देश में “मंहगाई दर” को घटाने की ज़रुरत है तो यह तो उनका काम है। उर्जित पटेल हों या शक्तिकान्त सब यही बताएँगे। महंगाई को कम करने के लिए आरबीआई के पास कुछ मौद्रिक तरीके हैं जिनके अनुसार ही सरकार अपनी नीतियां निर्धारित कर सकती है। उदाहरण के तौर पर महंगाई बढ़ने की दशा में आरबीआई अपना सीआरआर बढ़ाती है जिससे सभी बैंकों को अपनी नकदी का ज्यादा हिस्सा आरबीआई के पास रखना पड़ता है। फलतः बैंक सरकार को और अपने अन्य उद्योगपति ग्राहकों को ज्यादा ऋण नहीं दे पाते।

देश में लागू बैंकिंग नियमों के तहत हरेक बैंक को अपनी कुल नकदी का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होता है। इसे ही कैश रिजर्व रेश्यो (सीआरआर) या नकद आरक्षित अनुपात कहते हैं…

कायदे से तो आरबीआई एक स्वायत्त संस्था है। मौद्रिक नीतियों को बनाना उसका अधिकार है। उसे सरकार से पूछ कर सीआरआर तय करने की ज़रुरत ही नहीं है। पर इस तरह की स्वतंत्र कार्यशैली कहाँ पसंद आई सरकार को? पिछले कई महीनों से उर्जित पटेल और वित्तमंत्री के बीच हो रही लगातार तकरार की खबरें तो यही दर्शा रहीं हैं कि उर्जित पटेल मौद्रिक नीतियां तय करने के अपने अधिकार को स्वतन्त्रता से प्रयोग कर रहे थे जो सरकार को पसंद नहीं आ रहा था। 19 नवम्बर की बोर्ड बैठक में जब सीआरआर पर फिर तकरार बढ़ी तो पटेल ने इस मामले का पूरा फैसला फिर एक कमिटी के सुपर्द कर दिया। ऐसे कई अन्य फैसले जो सरकार आसानी से लेना चाहती थी वे उर्जित पटेल ने और कई तरीकों से टाले। ऐसे में खीज कर वित्त मंत्रालय के पास उर्जित पटेल पर इस्तीफे के दबाव बनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। इसके पहले रघु राम राजन के साथ भी सरकार का आंकड़ा छत्तीस का ही था।

चूंकि आर्थिक मामलों पर ज़बरदस्त पकड़ होने के नाते रघु राम राजन विश्व विख्यात थे, उनका अपना एक कद था तो उनका कद छोटा करने के लिए सरकार को बाकायदा सुब्रमण्यम स्वामी से लगातार महीनों राजन के खिलाफ ट्वीट कराने पड़े। अब उर्जित पटेल का क्या करें सोच में पड़ी सरकार के लिए पटेल ने इस्तीफा देकर रास्ता आसान कर दिया।

सरकार ने एक तरह से बाजी मार ही ली थी कि आ गया तीन राज्यों में हार का जनता का करारा थप्पड़। अब देखना है कि सरकार को समझ आता है कि नहीं कि आरबीआई को स्वायत्त रखना ही पड़ेगा क्योंकि भारतीय अर्थ को नियंत्रित कर पा रही आरबीआई का ही कमाल है कि पिछले कुछ सालों में जब कई बार पूरा विश्व मंदी के दौर में पड़ा तब भी भारत को रिज़र्व बैंक में संचित और आरक्षित धन के चलते ही बहुत बड़ी विपत्ति का सामना करना नहीं पड़ा। समझ में आने में ही भलाई है वरना तो रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता न चलने दी गयी तो फिर स्वायत्त जनता को 2019 में काबू में लाना संभव नहीं होगा।

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