The Golden Talk
by Anehas Shashwat

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व्यवस्था से खेलेंगे तो आप भी शिकार बनेंगे

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कोई भी व्यवस्था मुकम्मल नहीं होती, तो भी उसको चलाने वालों का जोर सिस्टम से ही चलने पर होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि तब कमियां पाए जाने पर या ग़लतियाँ होने पर व्यवस्था के तहत उनको सुधारना आसान होता है। हाँ, यह ज़रूर है कि यह प्रक्रिया कभी – कभी उबाऊ हो जाती है, लेकिन रिजल्ट हमेशा सही देती है। इसके उलट ऐसे लोग भी होते हैं जो अल्पकालिक फायदों के लिए व्यवस्था से खिलवाड़ करते हैं, इतिहास गवाह है कि शुरुआती सफलता भले मिल जाए देर – सबेर उस खिलवाड़ के शिकार वे खुद बनते हैं।

गोमती नगर का विवेक तिवारी काण्ड, व्यवस्था के साथ हुए ऐसे ही खिलवाड़ से जन्मा है, जिसके नतीजे सामने आने शुरू हो गए हैं। अपने यहाँ पुलिस का चरित्र कैसा है, यह बहुत पहले जस्टिस मुल्ला बता गए हैं, जब उन्होंने पुलिस को हथियार बंद गिरोह बताया था। वैसे भी पुलिस का काम विवेचना करना है, फैसला देना नहीं और उसके भी नियम हैं। अगर पुलिस का कहना सही भी मान लें कि विवेक का आचरण संदिग्ध था तो उसकी कार के टायर पर या उसके पैर पर गोली मार कर उसे काबू में लाया जा सकता था, इसके लिए बाकायदा प्राविधान है, संदिग्ध चरित्र वाले को भी पुलिस मार डाले, ऐसी व्यवस्था तो कानून की किसी भी किताब में नहीं है। लेकिन ज़बान से यह व्यवस्था पुलिस वालों के लिए कभी – कभी कर दी जाती है, वह भी समाज हित की दुहाई देकर।

किसी भी हथियार बंद संस्था के चरित्र के सारे पहलुओं का अंदाज़ न्याय व्यवस्था बनाने वाले बुद्धिमान लोगों को रहा होगा, इसीलिए पुलिस के हाथ उन्होंने सिर्फ विवेचना का अधिकार दिया वो भी नियमों के तहत, फैसला देने का अधिकार अदालतों को दिया गया, जहाँ जज हथियार लेकर नहीं बैठते, तो भी उन्हें पुलिस को कण्ट्रोल करने का अधिकार है। दिक्कत यहीं से शुरू होती है, जब जब इस व्यवस्था से खिलवाड़ होता है। अदालतों में न्याय मिलने में देरी होती है, इसलिए बड़े अपराधिओं के एनकाउंटर का बीच का रास्ता निकाला गया, लेकिन वो भी बेहद एहतियात के साथ कि सच में दुर्दांत अपराधी ही मारा जाया, इस के फायदे तो मिले लेकिन व्यवस्था के साथ खिलवाड़ तो यह है ही। नतीजे में कई बार जानबूझ कर व्यक्तिगत स्वार्थ में लोग मार डाले गए और बाद में हत्यारे पुलिस वालों का जीवन भी जेल में बीता।

अपने प्रदेश में एक रिवाज़ यह भी बन गया है कि कई बार सत्ता अपने हित में पुलिस के हथियारबंद संगठन का इस्तेमाल करती है, इस प्रवृत्ति का अपवाद आज की तारीख में कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं है, अपने समय पर सबने अपने जौहर दिखाए हैं। आज विवेक तिवारी है, कल रामकोला के किसान थे और परसों उत्तराखंड आन्दोलन के कार्यकर्ता। ये तो वो काण्ड हैं जो खुल गए, हालांकि इसमें भी जो दोषी पुलिस वाले थे या अफसर, उनका क्या हाल हुआ ये फ़साना अभी सामने आना बाकी है। और आखिर में सबसे चर्चित किस्सा भी सुन लीजिये, बहुतों को भूल गया होगा। विश्वनाथ प्रताप सिंह सूबे के मुख्यमंत्री थे, उस समय यहाँ डाकू दलों की बहुतायत थी। वी.पी. सिंह ने पुलिस को खुली छूट दे दी कि डाकुओं को मार गिराया जाए। ज्यादातर डाकू गिरोहों का सफाया हुआ भी, हालांकि तब के विरोधी दलों ने विश्वनाथ प्रताप सिंह पर आरोप लगाया कि डाकुओं की आड़ में उभर रहे दलित और पिछड़ी जाति के नेताओं को मार डाला गया। दस्यु-उन्मूलन तो बहाना था।

इसी अफरा-तफरी के माहौल में जब एक दिन खुद वी.पी. सिंह के भाई का काफिला इलाहाबाद के जंगलों से गुज़र रहा था तो उन्हें भी डाकू समझ कर गोली मार दी गई। काफी बमचख मची लेकिन होनी तो हो ही गई। अब वापस लौटिये विवेक तिवारी काण्ड पर। विवेक तो मर गया, दोषी कांस्टेबल की हालत भी मौत से बदतर समझिये। बाकी सामान्य पुलिस वालों की मनोदशा का अंदाज़ा उस फेसबुक पोस्ट से लगा लीजिये, जिसमें 1973 के पुलिस विद्रोह की याद दिलाई गई है। इस चेतावनी को सुनिए और पुलिस के इस्तेमाल से बाज़ आइए, तब के मुख्यमंत्री को विद्रोह के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा था।

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