The Golden Talk
by Anehas Shashwat

- Advertisement -

- Advertisement -

वाजिद अली शाह, बाबरी मस्जिद और आडवाणी

समय बदला, सरकार बदली समाधान फिर भी समझौता

657

दुनिया में एक से एक रोचक कथाएं हैं, जो कई बार विलुप्त हो जाती हैं लेकिन घूम-फिर कर लोगों के ज़ेहन में फिर से ताज़ा हो जाती हैं। ऐसे ही बाबरी मस्जिद कम से कम दो बार सत्ता-संधान का कारण बनी। फर्क बस इतना रहा कि पहली बार यह ढहाई नहीं जा सकी लेकिन सत्ता बदल गयी, दूसरी बार मस्जिद गयी साथ में सत्ता भी। दूसरी बार 1992 में जब मस्जिद ढहाई गयी तब से लेकर उसके फल प्रतिफल हम आज तक देख रहे हैं लेकिन पहली बार किस्सा जल्दी ही निपटा दिया गया था, हाँ एक बात और दोनों ही बार जोर इसी बात पर रहा कि यह समस्या, हिंसा या अदालत से नहीं बल्कि टिकाऊ तौर पर आपसी बातचीत और मध्यस्थता से ही सुलझेगी।

बहरहाल अब किस्सा सुनिए। ज़माना था 1854-55 का और लार्ड डलहौजी किसी भी तरह से तत्कालीन अवध पर कब्ज़ा करने को बेचैन था। लेकिन ऐसा हो सके इसके लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी के डायरेक्टर्स को इस बात के लिए मुत्मईन करना ज़रूरी था कि वाजिद अली शाह के अहद में अवध राज्य बदअमनी का शिकार था। इसके लिए झूठे-सच्चे तथ्यों की एक रिपोर्ट डायरेक्टर्स को दी गयी थी लेकिन वो उस से संतुष्ट नहीं थे। तब डलहौजी ने बहुत पुराने बाबरी मस्जिद विवाद को राज्य में बदअमनी फैलाने के लिए इस्तेमाल किया। तत्कालीन शासन में भी यही यथास्थिति बनाई गयी थी कि मस्जिद के बगल के चबूतरे को राम जन्मस्थान की मान्यता थी। डलहौजी के उकसाने पर कुछ मौलवियों और पंडितों ने अयोध्या में दंगा करा दिया, मुद्दा यही कि मस्जिद गिरा कर मंदिर बना दिया जाए। तत्कालीन रेजिडेंट ने डलहौजी के इशारे पर नवाब वाजिद अली शाह को दो बार शुरुआती हस्तक्षेप करने से बहाने से रोका ताकि दंगा कायदे से भड़क जाए।

लेकिन दंगा बेकाबू होते देख नवाब ने अयोध्या में सेना भेजी जिसे स्पष्ट आदेश थे कि बिना किसी भेदभाव के जो भी दंगाई है, उसे या तो गोली मार दी जाए या गिरफ्तार कर लिया जाए। इतना ही नहीं वाजिद अली शाह ने उन गांवों पर सामूहिक जुर्माना लगाया जिन गांवों के दंगाई थे। ज़ाहिर है इस कठोर कारवाई से दंगा तत्काल शांत हुआ। अमन बहाल होने के बाद नवाब ने इस समस्या पर फैसला सुनाया, उन्होंने कहा मैंने जब सत्ता संभाली उसके पहले से वहां पर मस्जिद और राम चबूतरा स्थित हैं और वे उसी स्थिति में बने रहने चाहिए, कानून यही है। अगर वहां पर श्री रामचन्द्रजी का मंदिर बनाने की मांग है तो दोनों ही फिरकों के अदीब मिलकर बैठें और एकराय हों, तो वहां पर मंदिर बने इसमें मुझे कोइ गुरेज़ नहीं।

शाह ने कहा इस समस्या का एकमात्र हल यही है, दंगों या शक्ति प्रदर्शन के बल पर मैं यथास्थिति को किसी भी कीमत पर नहीं बदलने दूंगा क्योंकि इससे दूसरी पेचीदगियां पैदा होंगी और सिलसिला बढ़ता ही जायेगा, जो राज्य और इसके निवासियों के हित में नहीं होगा। खैर उस समय तो नवाब की गद्दी बच गयी लेकिन अवध को हड़पने पर आमादा डलहौजी, नवाब को 1856 में गद्दी से उतार कर ही माना। नतीजा भी बहुत भीषण रहा, पूरे देश में विद्रोह फैल गया जिस पर बड़ी मुश्किल से अंग्रेजों ने काबू पाया वह भी बहुत बड़ी संख्या में जनहानि सहने के बाद।

Leave A Reply

Your email address will not be published.