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प्रेम के लिए एक दिन ही क्यूँ!

ये प्रेम कैसे होता है?

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बिपिन कुमार मिश्रा

बिपिन कुमार मिश्रा। प्रेम तो सिर्फ प्रेम होता है ना कोई स्वार्थ ना ही कोई लालच, न ही पाने की खुशी न ही खोने का डर! प्रेम कोई लक्ष्य तो नहीं जिसे पाना एकदम से जरूरी हो प्रेम तो अविरल होता है, अनंत होता है, निस्वार्थ होता है। अगर आप प्रेम मे हैं तो फिर आपको सिर्फ अपने प्रेमी की चिंता होती है! खुद के लालच और स्वार्थ के लिए तो प्रेम का होना संभव ही नहीं है। जो एक-दूसरे के लिए न हो प्रेम कैसे हो सकता है? जब आप किसी के प्रेम में होते हैं तो हर लम्हा, हर दिन, हर वीक वैलंटाइन्स होता है। बाकी तो सब छलावा है, ढोंग है, हवस है! मैं अक्सर सोचता हूँ कि अगर किसी से प्यार कहने के लिए क्या क्या माने होने चाहिए? क्या किसी को देख लेना, उसकी सुंदर चमड़ी देख लेना या फिर उसकी आँखें या फिर उसकी मीठी मीठी प्यारी बातें ही प्रेम का कारण हैं तो वो प्यार कैसे हो सकता है? वो तो एक आसक्ति होगा जो कि बहुत से लोगों को अलग अलग चीजों से हो जाती है। किसी को मोबाइल फोन से, किसी को गाड़ी से, किसी को टीवी देखना, घूमने जाना या फिर कई इसी तरह की चीजें। ये तो बस एक आसक्ति है, तो फिर हम आसक्ति को प्रेम के नाम से कैसे जोड़ देते हैं? आखिर क्या कारण है कि लोग ऐसा करते हैं?

क्या लोग अपनी हवस के लिए ऐसा करते हैं? क्या अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए लोग प्रेम को बदनाम नहीं कर देते? क्या पा लेना ही प्रेम है? क्या किसी को सिर्फ अपनी कामना की सिद्धि के लिए प्रेम को बदनाम करने का हक है?

रोज बदलते हुये इंटरनेट के इस दौर में वाकई में प्यार जैसी कोई चीज हो सकती है! की जा सकती है! जहाँ हर दिन नए लोग मिल रहे हों, नित्य नवीन चीजें आ रही हों। आखिर किसे कहें हम प्यार और क्यों कहें क्या कोई पैमाना है! जिससे हम माप सकें की यही प्रेम है सच्चा प्रेम!!

हम हर साल वैलंटाइन्स मनाते हैं आखिर ये प्रेम के लिए एक दिन क्यूँ मुकर्रर करके रखा गया है! कौन है वो किसने रखा ये, हम पूछना चाहते हैं प्रेम के लिए एक दिन ही क्यूँ??

हम अक्सर सवाल के लिए कुछ लिखते हैं। कुछ पढ़ते हैं। कई बार तो ये जताने की लिए देखो भाई हम लिख भी सकतें हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। इस बार हम कह रहे हैं कि जो भी हो रहा है प्यार के नाम पर वो अच्छा नहीं हो रहा है। इससे किसी का फायदा नहीं नुकसान के अलावा। हमने आखिर क्यूँ ये बनाया? क्यूँ क्यूँ?

बरसों पहले हम मिले थे कुछ दिन बाद हम अब बिछड़ जाएँगे तो क्या हमारा प्यार खत्म?

मैं वैलंटाइन्स के विरोध में नहीं हूँ पर इसके लिए जो पैमाने रखे गए हैं उनका क्या, अगर आप किसी से मिल गए तो आपका प्यार सफल नहीं मिल पाये तो देवदास!! ऐसा किस किताब में लिखा है कि प्रेम में मिलना / बिछड़ना मायने रखता है! प्रेम तो सिर्फ प्रेम होता है “खाली प्रेम”, “निश्छल / निस्वार्थ प्रेम” इसकी कोई परिभाषा या कोई नियम-कानून मुझे तो समझ नहीं आता। अगर प्रेम में भी नियम कानून होते होंगे तो वो भी समाज के लिये तो बिलकुल नहीं वो सिर्फ दो प्रेमियों के लिए ही होंगे।

समाज का कोई भी बंधन कोई भी कानून कोई भी रिवाज या रवायत प्रेम के आड़े नहीं आ सकती।

प्रेम तो वैसे ही अमर है जैसे की आत्मा अमर है। प्रेम की परिभाषा देना या कहना हमारे बस की बात नहीं। इसके लिए कोई प्रेम ग्रंथ हो तो भी मैं उसे नहीं मानता। क्योंकि वहाँ भी कुछ खामियाँ हो सकती हैं लेकिन प्रेम में तो कोई खामी ही नहीं है प्रेम तो सिर्फ प्रेम है।

आप सभी आज खूब ढंग से मनाइए वैलंटाइन्स लेकिन वो नहीं जो सिर्फ शरीर के चमड़े तक है। वो नहीं जो सिर्फ उसके गुलाबी गालों तक है। वो नहीं जो उसकी बड़ी बड़ी आँखों से है। वो नहीं जो उसके घुँघराले बालों तक सीमित है। वो नहीं जो सिर्फ पाना जानता है। वो नहीं जो सिर्फ उसे अपनी हवस को पूरा करने तक सीमित है। बल्कि वो जो उसके आत्मा से है, इस शरीर से परे है। वो जो उसके लिए त्याग भी कर सकता हो। वो जो उसके लिए अपनी जान भी दे सकता हो!

अगर आपके अंदर ऐसी कूव्वत है तो ही किसी से प्रेम कीजिये। अन्यथा अपने निहित स्वार्थ के लिए प्रेम जैसी पवित्र चीज को कलंकित मत कीजिये।

किसी ने कहा है – जिसमें फना है कई जज़्बात के समंदर वहीं एक कतरा प्रेम हूँ मैं!!